Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1133

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- असितः काश्यपो देवलो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ꣢व्या꣣ वा꣢रे꣣ प꣡रि꣢ प्रि꣣यो꣢꣫ हरि꣣र्व꣡ने꣢षु सीदति । रे꣣भो꣡ व꣢नुष्यते म꣣ती꣢ ॥११३३॥

अ꣡व्या꣢꣯ । वा꣡रे꣢꣯ । प꣡रि꣢꣯ । प्रि꣣यः꣢ । ह꣡रिः꣢꣯ । व꣡ने꣢꣯षु । सी꣣दति । रेभः꣢ । व꣣नुष्यते । मती꣣ ॥११३३॥

Mantra without Swara
अव्या वारे परि प्रियो हरिर्वनेषु सीदति । रेभो वनुष्यते मती ॥

अव्या । वारे । परि । प्रियः । हरिः । वनेषु । सीदति । रेभः । वनुष्यते । मती ॥११३३॥

Samveda - Mantra Number : 1133
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 8; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. गड़रियों को जैसे अपनी भेड़ें प्रिय होती हैं, इसी प्रकार वे प्रभु भी (अव्याः वारे) = भेड़ों = प्राणिमात्र के इस झुण्ड में [अवि=an ewe, वार=flock] (परि प्रियः) = सब ओर प्रेमवाले हैं। प्रभु किस प्राणी से प्रेम नहीं करते ? २. (हरिः) = ये दुःखों को हरनेवाले प्रभु (वनेषु) = उपासकों में – भक्तों में (सीदति) = विराजमान होते हैं । सर्वव्यापकता के नाते सबमें निवास करते हैं, ३. (रेभः) = ये स्तोता ही (मती) = [मत्या] बुद्धि के द्वारा उस प्रभु को (वनुष्यते) प्राप्त करता है । जैसे रूप का ग्रहण आँख से होता है, शब्द का श्रोत्र से, इसी प्रकार प्रभु का ग्रहण बुद्धि से होता है [दृश्यते त्वग्य्रया बुद्ध्या], क्योंकि यह स्तोता भक्त ही प्रभु का ग्रहण करता है, अतः प्रभु इसी के हृदय में विराजमान होते हैं । 
Essence
हम प्रभु की प्रिय भेड़ें हों। हम भक्त बनें, जिससे हमारा हृदय प्रभु का आसन बने।
Subject
प्रभु का आसन-हृदय