Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1129

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- असितः काश्यपो देवलो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
प्र꣢꣫ धारा꣣ म꣡धो꣢ अग्रि꣣यो꣢ म꣣ही꣢र꣣पो꣡ वि गा꣢꣯हते । ह꣣वि꣢र्ह꣣विः꣢षु꣣ व꣡न्द्यः꣢ ॥११२९॥

प्र । धा꣡रा꣢꣯ । म꣡धोः꣢꣯ । अ꣣ग्रियः꣢ । म꣣हीः꣢ । अ꣣पः꣢ । वि । गा꣣हते । हविः꣢ । ह꣣वि꣡ष्षु꣢ । व꣡न्द्यः꣢꣯ ॥११२९॥

Mantra without Swara
प्र धारा मधो अग्रियो महीरपो वि गाहते । हविर्हविःषु वन्द्यः ॥

प्र । धारा । मधोः । अग्रियः । महीः । अपः । वि । गाहते । हविः । हविष्षु । वन्द्यः ॥११२९॥

Samveda - Mantra Number : 1129
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 8; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(अग्रियः) = गुणों में सबसे प्रथम [उत्कृष्ट], सत्त्वगुण में वर्त्तमान होता हुआ, अर्थात् नित्यसत्त्वस्थ होता हुआ, (हवि:) = [हु दानादनयोः]=सदा दानपूर्वक अदन करनेवाला, यज्ञशेष का सेवन करनेवाला (हविःषु वन्द्यः) = त्यागियों में भी वन्दनीय, अर्थात् उत्तम त्यागशील व्यक्ति (मधोः धाराः) = मधु की वाणियों का अत्यन्त मधुर शब्दों का तथा (मही: अपः) = महनीय कर्मों का (प्रविगाहते) = प्रकर्षेण अवगाहन करता है, अर्थात् सात्त्विक व त्यागशील पुरुष मधुर वाणी का प्रयोग करता हुआ सदा उत्तम कर्मों को करनेवाला होता है ।

सात्त्विक भोजन के प्रयोग से हम अपनी अन्तःकरण की वृत्ति को सात्त्विक बनाएँ। अपने जीवन को त्यागमय बनाएँ, धन की अस्थिरता के चिन्तन से हम धन के प्रति आसक्त न हों और अपने व्यावहारिक जीवन में कभी कड़वी वाणी का प्रयोग न करें, सदा महनीय कर्मों को ही करनेवाले बनें ।
Essence
सात्त्विकता व त्यागवृत्ति को अपनाकर हम मधुरवाणी ही बोलें तथा प्रशंसनीय कर्मों को ही करें ।
Subject
मधुर वाणी महनीय कर्म