Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1126

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- असितः काश्यपो देवलो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ना꣢भा꣣ ना꣡भिं꣢ न꣣ आ꣡ द꣢दे꣣ च꣡क्षु꣢षा꣣ सू꣡र्यं꣢ दृ꣣शे꣢ । क꣣वे꣡रप꣢꣯त्य꣣मा꣡ दु꣢हे ॥११२६॥

ना꣡भा꣢꣯ । ना꣡भि꣢꣯म् । नः꣣ । आ꣢ । द꣣दे । च꣡क्षु꣢꣯षा । सू꣡र्य꣢꣯म् । दृ꣡शे꣢ । क꣣वेः꣢ । अ꣡प꣢꣯त्यम् । आ । दु꣣हे ॥११२६॥

Mantra without Swara
नाभा नाभिं न आ ददे चक्षुषा सूर्यं दृशे । कवेरपत्यमा दुहे ॥

नाभा । नाभिम् । नः । आ । ददे । चक्षुषा । सूर्यम् । दृशे । कवेः । अपत्यम् । आ । दुहे ॥११२६॥

Samveda - Mantra Number : 1126
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 8; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. ब्रह्माण्ड के सारे पदार्थ उस प्रभु में इसी प्रकार पिरोये हुए हैं जैसे सूत्र में मणिगण । इसी से उस प्रभु को ‘नाभि’ कहा गया है— उस प्रभु ने सारे लोकों को अपने में बाँधा हुआ है [नह बन्धने] । (नः नाभिम्) = हम सबको अपने में बाँधनेवाले उस बन्धुभूत प्रभु को (नाभा) = अपने शरीर के केन्द्रभूत हृदय में (आददे) = ग्रहण करता हूँ । हृदय में सब नाड़ियाँ केन्द्रित हैं, अतः वह नाभिस्थान है । २. (चक्षुषा) = ज्ञानचक्षु से (सूर्यम्) = सारे ब्रह्माण्ड को गति देनेवाले उस प्रभु को (दृशे) = देखने के लिए मैं (कवेः) = उस अजरामर कवि परमात्मा के (अपत्यम्) = सन्तानरूप इस वेदकाव्य को (आदुहे) = अपने में पूर्णरूप से दूहता हूँ, अर्थात् वेदज्ञान को प्राप्त करने का प्रयत्न करता हूँ । प्रभु की रचना होने से वेद प्रभु का पुत्र-सा है। उसके अध्ययन से मेरी बुद्धि शुद्ध होती है [बुद्धिर्ज्ञानेन शुध्यति] और मैं अपने ज्ञानचक्षुओं से प्रभु का दर्शन कर पाता हूँ, इसीलिए उसका हृदय में चिन्तन भी करता हूँ [नाभौ आददे]।

एवं, प्रभु-दर्शन के दो ही उपाय हैं—१. वेद के दोहन से मस्तिष्क का विकास, २. हृदय में प्रभु का चिन्तन । इस प्रकार मस्तिष्क और हृदयरूप अग्नियों को मिलाकर ही हम प्रभुरूप अग्नि का दर्शन कर पाएँगे।
Essence
हम हृदय में प्रभु का चिन्तन करें - मस्तिष्क को वेदज्ञान से पूर्ण करें, तभी प्रभु का दर्शन कर पाएँगे ।
Subject
कवि के अपत्य का दोहन