Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1123

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- असितः काश्यपो देवलो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
आ꣣पाना꣡सो꣢ वि꣣व꣡स्व꣢तो꣣ जि꣡न्व꣢न्त उ꣣ष꣢सो꣣ भ꣡ग꣢म् । सू꣢रा꣣ अ꣢ण्वं꣣ वि꣡ त꣢न्वते ॥११२३॥

आ꣣पाना꣡सः꣢ । वि꣣व꣡स्व꣢तः । वि꣣ । व꣡स्व꣢꣯तः । जि꣡न्व꣢꣯न्तः । उ꣣ष꣡सः꣢ । भ꣡ग꣢꣯म् । सू꣡राः꣢꣯ । अ꣡ण्व꣢꣯म् । वि । त꣣न्वते ॥११२३॥

Mantra without Swara
आपानासो विवस्वतो जिन्वन्त उषसो भगम् । सूरा अण्वं वि तन्वते ॥

आपानासः । विवस्वतः । वि । वस्वतः । जिन्वन्तः । उषसः । भगम् । सूराः । अण्वम् । वि । तन्वते ॥११२३॥

Samveda - Mantra Number : 1123
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 8; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(आपानास:) = सोम का सर्वथा पान करनेवाले, अर्थात् सोम को सर्वथा शरीर में ही व्याप्त करनेवाले (सूरा:) = विद्वान् लोग (विवस्वत:) = सूर्य के और (उषस:) = उषा के (भगम्) = ऐश्वर्य को (जिन्वन्तः) = अपने
अन्दर प्रेरित करते हुए (अण्वम्) = सूक्ष्म बौद्धिक व आत्मिक शक्तियों को (वितन्वते) = विस्तृत करते हैं। १. सोमपान से – वीर्यशक्ति को शरीर में ही सुरक्षित रखने से शरीर तो सृदृढ़ बनता ही है, इन्द्रियों की शक्ति के विकास के साथ बुद्धि भी सूक्ष्म बनती है और उस सूक्ष्म बुद्धि से आत्मतत्त्व का दर्शन होता है। एवं, सोमपान करनेवाले लोग बौद्धिक व आत्मिक शक्तियों का विकास करते हैं । २. ये अपने अन्दर सूर्य के ऐश्वर्य को प्रेरित करते हैं, अर्थात् प्राणशक्ति को बढ़ाते हैं । ('प्राणः प्रजानामुदयत्येषः सूर्यः'), यह सूर्य क्या उदय होता है, यह तो प्रजाओं का प्राण ही है । ३. उषा का ऐश्वर्य अन्धकार का दहन [उष+दाहे] है। यह तम को दूर करती है । एवं, सोमपान से मानस अन्धकार दूर होकर राग-द्वेषादि दूर हो जाते हैं ।
Essence
सोमपान से प्राणाशक्ति बढ़ती है, मानस राग-द्वेषादि दूर होते हैं, बौद्धिक व आत्मिक शक्तियों का विकास होता है ।
Subject
सूर्य व उषा का ऐश्वर्य