Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1108

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- बन्धुः सुबन्धुः श्रुतबन्धुर्विप्रबन्धुश्च क्रमेण गौपायना लौपायना वा Chhand- द्विपदा विराट् Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
व꣡सु꣢र꣣ग्नि꣡र्वसु꣢꣯श्रवा꣣ अ꣡च्छा꣢ नक्षि द्यु꣣म꣡त्त꣢मो र꣣यिं꣡ दाः꣢ ॥११०८॥

व꣡सुः꣢꣯ । अ꣣ग्निः꣢ । व꣡सु꣢꣯श्रवाः । व꣡सु꣢꣯ । श्र꣣वाः । अ꣡च्छ꣢꣯ । न꣣क्षि । द्युम꣡त्त꣢मः । र꣣यि꣢म् । दाः꣣ ॥११०८॥

Mantra without Swara
वसुरग्निर्वसुश्रवा अच्छा नक्षि द्युमत्तमो रयिं दाः ॥

वसुः । अग्निः । वसुश्रवाः । वसु । श्रवाः । अच्छ । नक्षि । द्युमत्तमः । रयिम् । दाः ॥११०८॥

Samveda - Mantra Number : 1108
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 7; Khand » 7;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रस्तुत मन्त्रों का ऋषि (‘बन्धु') = सबके साथ स्नेह करनेवाला, (सुबन्धुः) = सज्जनों का मित्र, (श्रुतबन्धुः) = ज्ञान की मित्रतावाला तथा (विप्रबन्धुः) = अपना पूरण करनेवालों का मित्र है। यह प्रभु की आराधना इन शब्दों में करता है । १. हे प्रभो ! (वसुः) = आप सबमें बसनेवाले व सभी को अपने में बसानेवाले हो। २. आप (अग्निः) = अग्रेणी: हो । हमें आगे और आगे ले-चलनेवाले हो । ३. (वसुश्रवाः) = [वसु उत्तम, rich धनी] उत्तम तथा धनी, अर्थात् व्यापक ज्ञानवाले हो । ४. (द्युमत्तमः) = अत्यन्त दीप्तिमय हो, आप (अच्छा नक्षि) = हममें आभिमुख्येन व्याप्त हो– हम आपकी व्याप्ति को अपने अन्दर अनुभव करनेवाले हों । ५. (रयिं दाः) = आप हमें ज्ञानरूप धन दीजिए । 
Essence
हे प्रभो! आप हमें प्राप्त होओ और ज्ञानधन प्राप्त कराओ ।
 
Subject
'बन्धु' द्वारा प्रभु का आराधन