Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1103

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- मनुः सांवरणः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
सु꣣ष्वाणा꣢सो꣣ व्य꣡द्रि꣢भि꣣श्चि꣡ता꣢ना꣣ गो꣡रधि꣢꣯ त्व꣣चि꣢ । इ꣡ष꣢म꣣स्म꣡भ्य꣢म꣣भि꣢तः꣣ स꣡म꣢स्वरन्वसु꣣वि꣡दः꣢ ॥११०३॥

सु꣣ण्वाणा꣡सः꣢ । वि । अ꣡द्रि꣢꣯भिः । अ । द्रि꣣भिः । चि꣡ता꣢꣯नाः । गोः । अ꣡धि꣢꣯ । त्व꣣चि꣢ । इ꣡ष꣢꣯म् । अ꣣स्म꣡भ्य꣢म् । अ꣣भि꣡तः꣢ । सम् । अ꣣स्वरन् । वसुवि꣡दः꣢ । व꣣सु । वि꣡दः꣢꣯ ॥११०३॥

Mantra without Swara
सुष्वाणासो व्यद्रिभिश्चिताना गोरधि त्वचि । इषमस्मभ्यमभितः समस्वरन्वसुविदः ॥

सुण्वाणासः । वि । अद्रिभिः । अ । द्रिभिः । चितानाः । गोः । अधि । त्वचि । इषम् । अस्मभ्यम् । अभितः । सम् । अस्वरन् । वसुविदः । वसु । विदः ॥११०३॥

Samveda - Mantra Number : 1103
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 7; Khand » 6;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (सुष्वाणासः) = सदा उत्तम [सु] शब्दों का उच्चारण करनेवाले [स्वान], २. (अद्रिभिः) = आदरणीय गुरुओं में (विचितानाः) = विशिष्ट ज्ञान को प्राप्त कराये जाते हुए, ३. (गोः) = सदा वेदवाणी के (अधित्वचि) = सम्पर्क में रहनेवाले [In touch with] ४. (वसुविदः) = [सर्वत्र वसतीति] सर्वव्यापक प्रभु का साक्षात्कार करनेवाले ज्ञानी लोग (अस्मभ्यम्) = हमारे लिए (इषम्) = वेदवाणी की प्रेरणा को (अभितः) = आचार्यकुल में भी आचार्य कुल से बाहर भी दोनों ओर, सब स्थानों में (समस्वरन्) = उच्चरित करें । आचार्य कैसे हों? इस प्रश्न का उत्तर इन शब्दों में दिया गया है कि वे १. सदा शुभ शब्दों का उच्चारण करनेवाले हों । उनके मुख से विद्यार्थियों के लिए कभी कोई अशुभ शब्द न निकले २. उन्होंने स्वयं आदरणीय गुरुओं से शिक्षा प्राप्त की हुई हो, ३. वे अपना जीवन वेदवाणी के सम्पर्क में बिता रहे हों । ४. उन्होंने ब्रह्मज्ञान प्राप्त किया हो ।

ऐसे आचार्य आचार्यकुलों में तो उपदेश देते ही हैं, गृहस्थ बन जाने पर भी इन आचार्यों का ज्ञानोपदेश प्राप्त होता रहे । इनके द्वारा वेदवाणी की प्रेरणा प्राप्त होती रहे ।
Essence
उत्तम आचार्यों से हम सदा वेदवाणी की प्रेरणा प्राप्त करें ।
Subject
आचार्य