Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1102

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- मनुः सांवरणः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
ते꣢ पू꣣ता꣡सो꣢ विप꣣श्चि꣢तः꣣ सो꣡मा꣢सो꣣ द꣡ध्या꣢शिरः । सू꣡रा꣢सो꣣ न꣡ द꣢र्श꣣ता꣡सो꣢ जिग꣣त्न꣡वो꣢ ध्रु꣣वा꣢ घृ꣣ते꣢ ॥११०२॥

ते꣢ । पू꣣ता꣡सः꣢ । वि꣣पश्चि꣡तः꣢ । वि꣣पः । चि꣡तः꣢꣯ । सो꣡मा꣢꣯सः । द꣡ध्या꣢꣯शिरः । द꣡धि꣢꣯ । आ꣣शिरः । सू꣡रा꣢꣯सः । न । द꣣र्शता꣡सः꣢ । जि꣣ग꣡त्न꣢वः । ध्रु꣣वा꣢ । घृ꣣ते꣢ ॥११०२॥

Mantra without Swara
ते पूतासो विपश्चितः सोमासो दध्याशिरः । सूरासो न दर्शतासो जिगत्नवो ध्रुवा घृते ॥

ते । पूतासः । विपश्चितः । विपः । चितः । सोमासः । दध्याशिरः । दधि । आशिरः । सूरासः । न । दर्शतासः । जिगत्नवः । ध्रुवा । घृते ॥११०२॥

Samveda - Mantra Number : 1102
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 7; Khand » 6;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रस्तुत मन्त्रों का ऋषि ‘मनुः'=अत्यन्त मननशील है और वह सांवरण:=सम्यक् उत्तम वरणवाला है। संसार में जीवन की सफलता का रहस्य इसी में है कि विचारशील [मनु] बनकर उत्तम चुनाव ही करें [सांवरण] । (ते) = ऐसे व्यक्ति १. (पूतासः) = पवित्र जीवनवाले होते हैं, २. (विपश्चित:) = विप:-वाणी का (चितः) = चिन्तन करनेवाले उत्तम ज्ञानी होते हैं, ३. (सोमासः) = अत्यन्त विनीत होते हैं, ४. (दध्याशिरः) = [धत्ते इति दधि] सारे संसार का धारण करनेवाले प्रभु का आश्रय करते हैं, ५. (सूरास न) = देदीप्यमान सूर्य के समान होते हैं । ज्ञान के द्वारा सूर्य की भाँति चमकते हैं, ६. (दर्शतासः) = वे दर्शनीय आकृतिवाले होते हैं और ८. (घृते) = देदीप्यमान प्रभु में (जिगत्नवः) = गतिवाले होते हैं, अर्थात् प्रभु के प्रति जानेवाले होते हैं, अन्त में प्रभु को प्राप्त होते हैं । 
Essence
मननशील व संवरणशील व्यक्ति प्रभु को प्राप्त करता है ।
Subject
मननशील व संवरणशील