Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 110

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- प्रयोगो भार्गवः सौभरि: काण्वो वा Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
मा꣡ नो꣢ हृणीथा꣣ अ꣡ति꣢थिं꣣ व꣡सु꣢र꣣ग्निः꣡ पु꣢रुप्रश꣣स्त꣢ ए꣣षः꣢ । यः꣢ सु꣣हो꣡ता꣢ स्वध्व꣣रः꣢ ॥११०॥

मा꣢ । नः꣣ । हृणीथाः । अ꣡ति꣢꣯थिम् । व꣡सुः꣢ । अ꣣ग्निः꣢ । पु꣣रुप्रशस्तः꣢ । पु꣣रु । प्रशस्तः꣢ । ए꣣षः꣢ । यः । सु꣣हो꣡ता꣢ । सु꣣ । हो꣡ता꣢꣯ । स्व꣣ध्वरः꣢ । सु꣣ । अध्वरः꣢ ॥११०॥

Mantra without Swara
मा नो हृणीथा अतिथिं वसुरग्निः पुरुप्रशस्त एषः । यः सुहोता स्वध्वरः ॥

मा । नः । हृणीथाः । अतिथिम् । वसुः । अग्निः । पुरुप्रशस्तः । पुरु । प्रशस्तः । एषः । यः । सुहोता । सु । होता । स्वध्वरः । सु । अध्वरः ॥११०॥

Samveda - Mantra Number : 110
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 12;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रभु अतिथि हैं। १. अतिथि की भाँति हमें प्रभु के दर्शन कभी-कभी होते हैं। २. वे हमें स्वर्ग प्राप्त करानेवाले हैं। ३. अतिथि की भाँति वे कहीं भी रम नहीं जाते। प्रभु अरति हैं। ४. वे सभी के हित के लिए सदा क्रियाशील हैं [अत् सातत्यगमने]। (अतिथिम्) = अतिथि प्रभु को (नः) = हमारे लिए (मा) = मत (हृणीथाः) = क्रुद्ध करो। हमारा सारा प्रयत्न ऐसा हो कि हम इस अतिथि की ठीक आराधना कर पाएँ - हमारा व्यवहार उसे अप्रसन्न करनेवाला न हो। हमें चाहिए कि जैसे वे प्रभु 'वसु, अग्नि, पुरु, प्रशस्त, सुहोता और स्वध्वर' हैं, हम भी उसी प्रकार वसु आदि बनने का प्रयत्न करें

१. (वसुः)=[वासयति] बसानेवाला है। प्रभु सबके बसानेवाले हैं, हमारे प्रयत्न भी इसी दिशा में हों। हम औरों के उजाड़नेवाले न बनें।

२. (अग्नि:)=[अग्रे नी:] प्रभु स्वयं सर्वोच्च स्थान में स्थित [परमेष्ठी] होते हुए सब जीवों को आगे और आगे चलने की प्रेरणा दे रहे हैं। हम भी अपने जीवन को ऊँचा बनाकर औरों की उन्नति में सहायक हों।

३. (पुरु-प्रशस्त:)=प्रभु 'पुरु' हैं [पृ-पालनपूरणयो:] सबके पालक व पूरक हैं- कमियों को दूर करनेवाले हैं, अतएव 'प्रशस्त' प्रशंसा योग्य हैं। हमारा जीवन भी पालक व पूरक बनकर प्रशस्त [admirable] हो ।

४. हम किस प्रभु को क्रुद्ध न करें? (यः)=जो (सुहोता) = उत्तम दाता हैं [हु दाने] । प्रभु की अपनी आवश्यकताएँ शून्य हैं, अतः वे खूब देनेवाले हैं—देने-ही- देनेवाले हैं। हम भी अपनी आवश्यकताओं को कम और कम करते हुए अपनी देने की क्षमता को बढ़ाएँ, सदा दानपूर्वक अदन [भक्षण] करनेवाले बनें। दें, और बचे हुए यज्ञशेष को खाएँ। यज्ञशेष ही अमृत है। यही ‘त्यक्तेन भुञ्जीथाः' का पाठ है।

५. (स्वध्वरः) = [सु अध्वर, ध्वृ हिंसायाम् ] वे प्रभु सर्वोत्तम अहिंसक हैं। हमारा जीवन का व्यवहार ऐसा हो कि वह औरों की किसी प्रकार की हिंसा व हानि करनेवाला न हो। अहिंसा परमधर्म है। शक्ति की परख निर्माण में है, हिंसा शक्ति की सूचक नहीं।

इन वसु आदि गुणों का अपने साथ उत्तम मेल करनेवाले - प्रकृष्ट योग= सम्बन्ध करनेवाले ही इस मन्त्र के ऋषि 'प्रयोग' हुआ करते हैं। यह सब तपस्या से साध्य है, अतः यह प्रयोग 'भार्गव'– भृगु = तपस्वी [भ्रस्ज पाके] का पुत्र है - खूब तपस्वी है, इस मार्ग पर चलनेवाला 'सोभरि' = उत्तम पालन करनेवाला है। यही 'काण्व'- मेधावी है। 
Essence
मनुष्य वसु आदि गुणों से सम्पन्न बनकर उस प्रभु की आराधना करे ।
Subject
हम अतिथि को क्रुद्ध न करें