Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 11

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- आयुङ्क्ष्वाहिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
न꣡म꣢स्ते अग्न꣣ ओ꣡ज꣢से गृ꣣ण꣡न्ति꣢ देव कृ꣣ष्ट꣡यः꣢ । अ꣡मै꣢र꣣मि꣡त्र꣢मर्दय ॥११॥

न꣡मः꣢꣯ । ते꣣ । अग्ने । ओ꣡ज꣢꣯से । गृ꣣ण꣡न्ति꣢ । दे꣣व । कृष्ट꣡यः꣢ । अ꣡मैः꣢꣯ । अ꣣मि꣡त्र꣢म् । अ꣣ । मि꣡त्र꣢꣯म् । अ꣣र्दय ॥११॥

Mantra without Swara
नमस्ते अग्न ओजसे गृणन्ति देव कृष्टयः । अमैरमित्रमर्दय ॥

नमः । ते । अग्ने । ओजसे । गृणन्ति । देव । कृष्टयः । अमैः । अमित्रम् । अ । मित्रम् । अर्दय ॥११॥

Samveda - Mantra Number : 11
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(अग्ने ओजसे)=हे प्रभो ! बल-प्राप्ति के हेतु से हम (ते नम:)= तेरे लिए नमस्कार करते हैं। अनन्त शक्ति के स्रोत आप ही हैं, भक्ति के द्वारा आपसे सम्बद्ध हो हम भी उस शक्ति को अपने अन्दर प्रवाहित करते हैं। भक्ति से वह शक्ति प्राप्त होती है जो पर्वत तुल्य कष्टों में भी मनुष्य को विचलित न होने योग्य बनाती है।
२. परन्तु हे (देव) =सब आवश्यक पदार्थों के देनेवाले प्रभो! (कृष्टयः)= कृषि करनेवाले मनुष्य ही (गृणन्ति)= तेरी सच्ची आराधना करते हैं। वे अन्न-वस्त्रादि जुटाकर आपकी भाँति आवश्यक पदार्थों के देनेवाले हैं।

३. (अमैः)= शक्तियों से (अमित्रम्)= शत्रु को (अर्दय)= समाप्त कीजिए । हे प्रभो! शारीरिक शक्ति से, तेज व वीर्य से हम रोगकृमिरूप शत्रुओं को नष्ट करनेवाले हों। मानस ओज व स्नेह के बल से हम काम, क्रोधादि को नष्ट कर विश्वप्रेम को अपने जीवन में ला सकें। बौद्धिक ज्ञान के बल से अज्ञानरूप शत्रु को हम समाप्त कर दें।
इस सबके लिए हमारे जीवन का आदर्श वाक्य (आयुङ्क्ष्व) 'काम में लगे रहो " तथा 'अहि' [अ-हन] 'समय को नष्ट मत करो" यह बने तथा हम इस मन्त्र के ऋषि ‘आयुङ्क्ष्वाहि' बनें।
Essence
[१] भक्ति से शक्ति मिलती है, [२] सच्ची भक्ति के लिए कृषक का जीवन आदर्श है, [३] शक्ति से शत्रुओं की समाप्ति हो जाती है।
Subject
भक्ति से शक्ति की प्राप्ति