Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1088

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
उ꣡प꣢ नः꣣ स꣢व꣣ना꣡ ग꣢हि꣣ सो꣡म꣢स्य सोमपाः पिब । गो꣣दा꣢꣫ इद्रे꣣व꣢तो꣣ म꣡दः꣢ ॥१०८८॥

उ꣡प꣢꣯ । नः꣣ । स꣡व꣢꣯ना । आ । ग꣣हि । सो꣡म꣢꣯स्य । सो꣡मपाः । सोम । पाः । पिब । गोदाः꣢ । गो꣣ । दाः꣢ । इत् । रे꣣व꣡तः꣢ । म꣡दः꣢꣯ ॥१०८८॥

Mantra without Swara
उप नः सवना गहि सोमस्य सोमपाः पिब । गोदा इद्रेवतो मदः ॥

उप । नः । सवना । आ । गहि । सोमस्य । सोमपाः । सोम । पाः । पिब । गोदाः । गो । दाः । इत् । रेवतः । मदः ॥१०८८॥

Samveda - Mantra Number : 1088
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 7; Khand » 5;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
मन्त्र के ऋषि 'मधुच्छन्दा'=मधुर इच्छाओंवाले ‘वैश्वामित्र:'=सबके मित्र से प्रभु कहते हैं १. (नः) = हमारे (सवना) = यज्ञों को–‘प्रातः, माध्यन्दिन तथा सायन्तन सवनों' को (उपागहि) = तू समीपता से प्राप्त होनेवाला हो । तेरा जीवन वेदोपदिष्ट यज्ञों को करनेवाला हो । २. हे (सोमपा:) = सोम का पान करनेवाले–शक्ति को शरीर में ही सुरक्षित करनेवाले! तू (सोमस्य पिब) = सोम का पान कर। वीर्य को शरीर में ही व्याप्त करने का प्रयत्न कर । ३. (रेवतः) = धनवाले तेरा (मदः) = हर्ष (इत्) = निश्चय से (गोदाः) = गौओं का देनेवाला हो, धनी बनकर तू प्रसन्नतापूर्वक गौओं का दान करनेवाला बन। 
Essence
प्रभु हमसे तीन बातें चाहते हैं – १. हम यज्ञमय जीवन बिताएँ, २. सोमपान करें और ३. धनी बनकर दान दें । वस्तुतः यह तीन ही मौलिक उत्तम इच्छाएँ हैं।
Subject
यज्ञ-सोमपान-दान