Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1086

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- शुनःशेप आजीगर्तिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
आ꣡ यद्दुवः꣢꣯ शतक्रत꣣वा꣡ कामं꣢꣯ जरितॄ꣣णा꣢म् । ऋ꣣णो꣢꣫रक्षं꣣ न꣡ शची꣢꣯भिः ॥१०८६॥

आ । यत् । दु꣡वः꣢꣯ । श꣣तक्रतो । शत । क्रतो । आ꣢ । का꣡म꣢꣯म् । ज꣣रितॄणा꣢म् । ऋ꣣णोः꣢ । अ꣡क्ष꣢꣯म् । न । श꣡ची꣢꣯भिः ॥१०८६॥

Mantra without Swara
आ यद्दुवः शतक्रतवा कामं जरितॄणाम् । ऋणोरक्षं न शचीभिः ॥

आ । यत् । दुवः । शतक्रतो । शत । क्रतो । आ । कामम् । जरितॄणाम् । ऋणोः । अक्षम् । न । शचीभिः ॥१०८६॥

Samveda - Mantra Number : 1086
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 7; Khand » 5;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(शचीभिः) = अपने प्रज्ञानों व कर्मों से जो (अक्षं न) = एक धुरे के समान है, अर्थात् जिसके जीवन में ज्ञान और कर्म एक पक्षी के दायें व बायें पंखों के समान हैं, उन (जरितॄणाम्) - स्तोताओं की (कामम्) = कामना को हे (शतक्रतो) = अनन्त प्रज्ञानों व कर्मोंवाले प्रभो ! (आऋणोः) = प्राप्त कराइए । (यत्) = जो (दुवः) = धन है, अर्थात् जिस भी वस्तु से मनुष्य वस्तुतः धन्य बनता है, उसे इन स्तोताओं को सर्वथा दीजिए ।

यदि मनुष्य अपने जीवन में कर्म व ज्ञान का समन्वय करके चलता है तो उसके जीवन में सच्ची प्रभु-भक्ति होती है । इन प्रभु-भक्तों की कामना को प्रभु पूर्ण करते हैं तथा इन्हें वह सम्पत्ति प्राप्त कराते हैं, जिससे इनका जीवन सचमुच धन्य हो जाता है । 
Essence
मेरे जीवन में ज्ञान व कर्म का सुन्दर समन्वय हो । मैं 'ज्ञानयोगव्यवस्थितिः' वाला बनूँ ।
Subject
धन्यता