Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1083

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- अमहीयुराङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
स꣢ नो꣣ भ꣡गा꣢य वा꣣य꣡वे꣢ पू꣣ष्णे꣡ प꣢वस्व꣣ म꣡धु꣢मान् । चा꣡रु꣢र्मि꣣त्रे꣡ वरु꣢꣯णे च ॥१०८३॥

सः । नः꣣ । भ꣡गा꣢꣯य । वा꣣य꣡वे꣢ । पू꣣ष्णे꣢ । प꣣वस्व । म꣡धु꣢꣯मान् । चा꣡रुः꣢꣯ । मि꣣त्रे꣢ । मि꣣ । त्रे꣢ । व꣡रु꣢꣯णे । च꣣ ॥१०८३॥

Mantra without Swara
स नो भगाय वायवे पूष्णे पवस्व मधुमान् । चारुर्मित्रे वरुणे च ॥

सः । नः । भगाय । वायवे । पूष्णे । पवस्व । मधुमान् । चारुः । मित्रे । मि । त्रे । वरुणे । च ॥१०८३॥

Samveda - Mantra Number : 1083
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 7; Khand » 4;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रभु इस अमहीयु से कहते हैं कि (मित्रे वरुणे च) = प्राण और अपान में (चारु:) = सुन्दर ढंग से विचरण करनेवाला, अर्थात् प्राणायाम द्वारा प्राणापान की उत्तम साधना करनेवाला (मधुमान्) = अत्यन्त माधुर्यमय जीवनवाला होकर (सः) = वह तू (न:) = हमारे (भगाय) = ऐश्वर्य के लिए (वायवे) = [वायुः=प्राणः] प्राणशक्ति के लिए तथा (पूष्णे) = पुष्टि के लिए (पवस्व) = प्राप्त हो।

‘अमहीयु' बनने के लिए पार्थिव भोगों की लिप्सा से ऊपर उठने के लिए प्राणसाधना ही एकमात्र उपाय है। इस प्राणासाधना के लाभ निम्न हैं – १. हमारा जीवन मधुर बनता है मधुमान्हमारे मनों में ईर्ष्या-द्वेष नहीं रहते । २. हम ज्ञानरूप उत्कृष्ट ऐश्वर्य को प्राप्त करनेवाले होते [भग] । ३. हमारी प्राणशक्ति ठीक होने से हम क्रियाशील बने रहते हैं—हमें आलस्य नहीं घेरता [वायु]। ४. हमारा अङ्ग-प्रत्यङ्ग सुपुष्ट बना रहता है [पूषन्] ।
Essence
प्राणसाधना के द्वारा हम 'माधुर्य, ऐश्वर्य, प्राणशक्ति व पुष्टि' प्राप्त करें ।
Subject
प्राणसाधना का महत्त्व