Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1071

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- त्रिशोकः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
य꣡स्य꣢ ते꣣ वि꣡श्व꣢मानु꣣ष꣡ग्भूरे꣢꣯र्द꣣त्त꣢स्य꣣ वे꣡द꣢ति । व꣡सु꣢ स्पा꣣र्हं꣡ तदा भ꣢꣯र ॥१०७१॥

य꣡स्य꣢꣯ । ते꣣ । वि꣡श्व꣢꣯म् । अ꣣नुष꣢क् । अ꣣नु । स꣢क् । भू꣡रेः꣢꣯ । द꣣त्त꣡स्य꣢ । वे꣡द꣢꣯ति । व꣡सु꣢꣯ । स्पा꣣र्ह꣢म् । तत् । आ । भ꣣र ॥१०७१॥

Mantra without Swara
यस्य ते विश्वमानुषग्भूरेर्दत्तस्य वेदति । वसु स्पार्हं तदा भर ॥

यस्य । ते । विश्वम् । अनुषक् । अनु । सक् । भूरेः । दत्तस्य । वेदति । वसु । स्पार्हम् । तत् । आ । भर ॥१०७१॥

Samveda - Mantra Number : 1071
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 7; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
हे प्रभो! (भूरेः) = [भृ=-धारणपोषण] धारण-पोषण के लिए आवश्यक (ते यस्य) = आपके जिस (दत्तस्य) = दान का (विश्वम्) = सम्पूर्ण संसार (आनुषक्) = निरन्तर (वेदति) = लाभ प्राप्त करता है, (तत्) = उस (स्पार्हम् वसु) = स्पृहणीय धन को (आभर) = मुझमें भी पूर्ण कीजिए। आपकी कृपा से मैं भी अपनी जीवन-यात्रा में क्रमशः आवश्यक धनों को प्राप्त करता चलूँ । आवश्यक धन की मुझे कमी न रहे। आपकी कृपा से कण-कण करके सम्पत्ति का संचय करते हुए मैं अपने शरीर, मन और बुद्धि तीनों को ही दीप्त बनाकर इस मन्त्र का ऋषि ‘त्रिशोक काण्व' बन जाऊँ । 
Essence
हम समय-समय पर जीवन-यात्रा के लिए आवश्यक वस्तुओं को प्राप्त करनेवाले बनें ।
 
Subject
निरन्तर वसु-लाभ