Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1068

1875 Mantra
Devata- आदित्याः Rishi- वसिष्ठो मैत्रावरुणिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
रा꣣या꣡ हि꣢रण्य꣣या꣢ म꣣ति꣢रि꣣य꣡म꣢वृ꣣का꣢य꣣ श꣡व꣢से । इ꣣यं꣡ विप्रा꣢꣯ मे꣣ध꣡सा꣢तये ॥१०६८॥

रा꣡या꣢ । हि꣣रण्यया꣢ । म꣣तिः꣢ । इ꣣य꣢म् । अ꣣वृका꣡य꣢ । अ꣣ । वृका꣡य꣢ । श꣡व꣢꣯से । इ꣣य꣢म् । वि꣡प्रा꣢꣯ । वि । प्रा꣣ । मेध꣡सा꣢तये । मे꣣ध꣢ । सा꣣तये ॥१०६८॥

Mantra without Swara
राया हिरण्यया मतिरियमवृकाय शवसे । इयं विप्रा मेधसातये ॥

राया । हिरण्यया । मतिः । इयम् । अवृकाय । अ । वृकाय । शवसे । इयम् । विप्रा । वि । प्रा । मेधसातये । मेध । सातये ॥१०६८॥

Samveda - Mantra Number : 1068
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 7; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
प्राणापान की साधना से वीर्य सुरक्षित होता है । इसके साथ ही एक मननशक्ति भी प्राप्त होती है, जिसके कारण मनुष्य अपनी शक्ति का प्रयोग हिंसा के लिए नहीं करता । मन्त्र में कहते हैं (हिरण्यया राया) = वीर्यरूप सम्पत्ति के साथ (इयं मतिः) = यह बुद्धि व विचारशक्ति भी मिलती है, जिसके परिणामस्वरूप मनुष्य (अवृकाय) = औरों के जीवन का आदान न करनेवाले, अर्थात् अहिंसक (शवसे) = बल के लिए होता है । वह शक्ति तो प्राप्त करता है, परन्तु उसकी शक्ति संहार के लिए नहीं होती ।

(इयम्) = यह मति और शक्ति (विप्रा) = विशेषरूप से वसिष्ठ के जीवन का पूरण करनेवाली होती है और अन्त में (मेधसातये) = उस यज्ञरूप प्रभु की प्राप्ति के लिए होती है। संक्षेप में प्राणापान [मित्र+वरुण] की साधना के निम्न लाभ हैं – १. वीर्य सम्पत्ति प्राप्त होती है [राया हिरण्यया] । २. मननशक्ति बढ़ती है- मनुष्य विचारशील बनता है [मतिः] । ३. इस प्राणसाधक का बल रक्षक होता है न कि हिंसक [अवृकाय शवसे] । ४. यह जीवन की न्यूनताओं को दूर करनेवाली होती है, ५. अन्त में प्रभु को प्राप्त कराती है।
Essence
हम प्राणसाधना द्वारा शक्ति व मति को प्राप्त करनेवाले बनें ।
Subject
शक्ति+मति