Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1067

1875 Mantra
Devata- आदित्याः Rishi- वसिष्ठो मैत्रावरुणिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
प्र꣡ति꣢ वा꣣ꣳसू꣢र꣣ उ꣡दि꣢ते मि꣣त्रं꣡ गृ꣢णीषे꣣ व꣡रु꣢णम् । अ꣣र्यम꣡ण꣢ꣳ रि꣣शा꣡द꣢सम् ॥१०६७॥

प्र꣡ति꣢꣯ । वा꣣म् । सू꣡रे꣢꣯ । उ꣡दि꣢꣯ते । उत् । इ꣣ते । मित्र꣢म् । मि꣣ । त्र꣢म् । गृ꣣णीषे । व꣡रु꣢꣯णम् । अ꣣र्यम꣡ण꣢म् । रि꣣शा꣡द꣢सम् ॥१०६७॥

Mantra without Swara
प्रति वाꣳसूर उदिते मित्रं गृणीषे वरुणम् । अर्यमणꣳ रिशादसम् ॥

प्रति । वाम् । सूरे । उदिते । उत् । इते । मित्रम् । मि । त्रम् । गृणीषे । वरुणम् । अर्यमणम् । रिशादसम् ॥१०६७॥

Samveda - Mantra Number : 1067
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 7; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
वैदिक योगशास्त्र में 'मित्र' प्राण है और 'वरुण' अपान है । प्राणापान की साधना के द्वारा अपने पर वश करनेवाला वसिष्ठ ' मैत्रावरुणि' है । प्रस्तुत मन्त्रों का यही ऋषि है। यह प्राणापान को ही सम्बोधित करके कहता है कि (वाम्) = आप दोनों में से (प्रति सूरे उदिते) = प्रतिदिन सूर्योदय के समय (मित्रम्) = प्राण ही (अर्यमणम्) = [अरीन् नियच्छति–नि० ११.२३] कामादि शत्रुओं का संहार करता है और [अर्यमेति तमाहुः यो ददाति – तै० १.१.२] शक्ति देता है, इस रूप में (गृणीषे) = स्तुति करता हूँ। (वरुणम्) = अपान का [अपानो वरुणः – शत० ८.४.२.६] (रिशादसम्) = 'हिंसकों का खा जानेवाला है अथवा हिंसकों का नाश करनेवाला है', इस रूप में [गृणीषे] स्तवन करता हूँ । प्राण शक्ति देता है, तो अपान दोषों को दूर करता है। इन प्राणापानों की इस रूप में स्तुति करता हुआ वसिष्ठ प्राणापान की साधना करता है। इनकी साधना करके वह उत्तम जीवनवाला ‘वसिष्ठ'=अतिशयेन वसुमान् बनता है।
Essence
प्राणापान की साधना से नीरोगता, निर्मलता व बुद्धि की विशिष्टता प्राप्त होती हैं।
Subject
मित्र व वरुण का स्तवन