Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1062

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- जमदग्निर्भार्गवः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ꣣भि꣡ गव्या꣢꣯नि वी꣣त꣡ये꣢ नृ꣣म्णा꣡ पु꣢ना꣣नो꣡ अ꣢र्षसि । स꣣न꣡द्वा꣢जः꣣ प꣡रि꣢ स्रव ॥१०६२॥

अ꣣भि꣢ । ग꣡व्या꣢꣯नि । वी꣣त꣡ये꣢ । नृ꣣म्णा꣢ । पु꣣नानः꣢ । अ꣣र्षसि । सन꣡द्वा꣢जः । स꣣न꣢त् । वा꣣जः । प꣡रि꣢꣯ । स्र꣣व ॥१०६२॥

Mantra without Swara
अभि गव्यानि वीतये नृम्णा पुनानो अर्षसि । सनद्वाजः परि स्रव ॥

अभि । गव्यानि । वीतये । नृम्णा । पुनानः । अर्षसि । सनद्वाजः । सनत् । वाजः । परि । स्रव ॥१०६२॥

Samveda - Mantra Number : 1062
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 7; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रभु मन्त्र के ऋषि ‘जमदग्नि भार्गव' से कहते हैं कि तू (गव्यानि) = [गोर्वाक् तद्विकारभूतानि शास्त्रवचनानि] वेदवचनों की (अभि अर्षसि) = ओर जाता है, अर्थात् तू निरन्तर वेदवाणियों को अपनाता है । १. (वीतये) = सब प्रकार के दुरितों के निरसन के लिए [वी असन] । वेदवाणियों के श्रवण व मनन से तू अपने दुरितों व मलों को दूर करता है और २. (नृम्णा पुनान:) = अपने बलों को पवित्र करता है। पवित्र बल में हिंसा की भावना नहीं होती – यह बल 'शान्त' होता है । (सनत् वाज:) = बलों का सेवन करनेवाला तू (परिस्रव) = [स्रु गतौ] चारों ओर इस वेदवाणी के प्रचार के लिए गतिवाला हो- परिव्राजक बन।
Essence
१. ब्रह्मचर्याश्रम में वेदवाणी को अपनाएँ, २. गृहस्थ में दुरितों को दूर करें, ३. वनस्थ होकर अपने बलों को पवित्र करें और ४. संन्यास में शक्तिशाली बनकर वेदवाणी के प्रचारार्थ परिव्राजक बनें ।
Subject
परिव्राजक