Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1060

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- अवत्सारः काश्यपः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
आ꣡ ययो꣢꣯स्त्रि꣣ꣳश꣢तं꣣ त꣡ना꣢ स꣣ह꣡स्रा꣢णि च꣣ द꣡द्म꣢हे । त꣢र꣣त्स꣢ म꣣न्दी꣡ धा꣢वति ॥१०६०॥

आ꣢ । य꣡योः꣢꣯ । त्रि꣣ꣳश꣡त꣢म् । त꣡ना꣢꣯ । स꣣ह꣡स्रा꣢णि । च꣣ । द꣡द्म꣢꣯हे । त꣡र꣢꣯त् । सः । म꣣न्दी꣢ । धा꣣वति ॥१०६०॥

Mantra without Swara
आ ययोस्त्रिꣳशतं तना सहस्राणि च दद्महे । तरत्स मन्दी धावति ॥

आ । ययोः । त्रिꣳशतम् । तना । सहस्राणि । च । दद्महे । तरत् । सः । मन्दी । धावति ॥१०६०॥

Samveda - Mantra Number : 1060
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 7; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(ययोः) = जिन प्राणापानों के (तना) = [तना – - धननाम – नि० २-१०] धनों को अथवा विस्तार को [तनु विस्तारे] (च सहस्राणि) = और शक्तिदानों को (त्रिंशतम्) = तीसों दिन, अर्थात् बिना एक भी दिन के विच्छेद के (आदमहे) = हम स्वीकार करते हैं, लेने का प्रयत्न करते हैं तो (तरत्) = योग-मार्ग के सब विघ्नों को पार करता हुआ (सः) = यह 'अवत्सार काश्यप' (मन्दी) = आनन्दमय जीवनवाला होकर (धावति) = मार्ग पर तीव्रता से बढ़ता है और शुद्ध जीवनवाला होता है । 

योगदर्शन में इसी भावना को 'दीर्घकाल और नैरन्तर्य' शब्दों के प्रयोग से कहा गया है। हमें श्रद्धापूर्वक प्राणसाधना में लगना चाहिए। त्रिंशतम्-यह द्वितीया विभिक्ति का प्रयोग ‘अत्यन्त संयोग' को कहता हुआ निरन्तर प्राणसाधना पर बल दे रहा है । 'तीसों दिन', अर्थात् लगातार, प्रतिदिन, बिना विच्छेद के।
Essence
निरन्तर प्राणसाधना में लगे रहेंगे तो प्राणों के धन व बल को प्राप्त करेंगे। योग की विभूतियाँ ही प्राणों का धन है।
 
Subject
निरन्तर प्राणसाधना