Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1059

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- अवत्सारः काश्यपः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ध्व꣣स्र꣡योः꣢ पुरु꣣ष꣢न्त्यो꣣रा꣢ स꣣ह꣡स्रा꣢णि दद्महे । त꣢र꣣त्स꣢ म꣣न्दी꣡ धा꣢वति ॥१०५९॥

ध्व꣣स्र꣡योः꣢ । पु꣣रुष꣡न्त्योः꣢ । पु꣣रु । स꣡न्त्योः꣢꣯ । आ । स꣣ह꣡स्रा꣢णि । द꣣द्महे । त꣡र꣢꣯त् । सः । म꣣न्दी꣢ । धा꣣वति ॥१०५९॥

Mantra without Swara
ध्वस्रयोः पुरुषन्त्योरा सहस्राणि दद्महे । तरत्स मन्दी धावति ॥

ध्वस्रयोः । पुरुषन्त्योः । पुरु । सन्त्योः । आ । सहस्राणि । दद्महे । तरत् । सः । मन्दी । धावति ॥१०५९॥

Samveda - Mantra Number : 1059
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 7; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
शरीर के सब मलों व रोगकृमियों को प्राणापानशक्ति ही ध्वस्त करती है, अतः इन्हें यहाँ 'ध्वस्त्र' नाम दिया गया है – ध्वंस करनेवाले । मलों को धवस्त करके ये प्राणापान हमारे शरीर के अङ्ग-प्रत्यङ्ग के पालन व पोषण के लिए [पुरु] विविध षन्ति = gift = शक्तियों की भेंटों को प्राप्त कराते हैं, अतः ये 'पुरु षन्ति' नामवाले हो गये हैं । इन (ध्वस्त्रयोः) = मलों का ध्वंस करनेवाले (पुरुषन्त्योः) = पालन व पूरण करनेवाली शक्तियों की भेंट देनेवाले प्राणापानों के (सहस्राणि) = [सहस्+र] शक्ति-दानों को (आदमहे) = हम स्वीकार करते हैं । सहस्र शब्द 'सहस्-बल को राति=देता है' इस व्युत्पत्ति से ‘शक्तिदान' का वाचक है । सारी शक्ति का दान प्राणापान ही पर निर्भर करता है । इन प्राणापानों से शक्ति प्राप्त करनेवाला (सः) = वह 'अवत्सार' (तरत्) = विघ्नों व रोगों को तरता हुआ (मन्दी) = उल्लासमय जीवनवाला (धावति) = आगे और आगे बढ़ता है और अधिकाधिक शुद्ध होता जाता है।
Essence
प्राणापान 'ध्वस्र' हैं, 'पुरु षन्ति' हैं, इस तत्त्व को समझकर हम इनसे शक्तिदान प्राप्त करनेवाले हों ।
Subject
प्राण और व्यान