Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1058

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- अवत्सारः काश्यपः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
उ꣣स्रा꣡ वे꣢द꣣ व꣡सू꣢नां꣣ म꣡र्त꣢स्य दे꣣व्य꣡व꣢सः । त꣢र꣣त्स꣢ म꣣न्दी꣡ धा꣢वति ॥१०५८॥

उ꣣स्रा꣢ । उ꣣ । स्रा꣢ । वे꣣द । व꣡सू꣢꣯नाम् । म꣡र्त꣢꣯स्य । दे꣣वी꣢ । अ꣡व꣢꣯सः । त꣡र꣢꣯त् । सः । म꣣न्दी꣢ । धा꣣वति ॥१०५८॥

Mantra without Swara
उस्रा वेद वसूनां मर्तस्य देव्यवसः । तरत्स मन्दी धावति ॥

उस्रा । उ । स्रा । वेद । वसूनाम् । मर्तस्य । देवी । अवसः । तरत् । सः । मन्दी । धावति ॥१०५८॥

Samveda - Mantra Number : 1058
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 7; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रस्तुत मन्त्रों का ऋषि ‘अवत्सार काश्यप'= जब शरीर की सारभूत वस्तु सोम की रक्षा करनेवाला होता है और परिणामतः ज्ञानी बनता है तब १. (उस्स्रा) = उष:काल उसे (वसूनाम्) = सब उत्तम वस्तुओं को [वसु = goods] (वेद) = प्राप्त कराता है । यह प्रातः काल जागता है और जीवन को उत्तम बनाने के = सङ्कल्प से अपने दिन को प्रारम्भ करता है । २. यह उष:काल तो वस्तुतः (मर्तस्य) = सामान्य मरणधर्मा मनुष्य को (देवी) = दिव्य जीवनवाला बना देता है । अन्यत्र वेद में इसी भावना को, ('उषर्बुधो हि देवा:) '=' देव प्रातः जागरणवाले होते हैं ', इन शब्दों से व्यक्त किया गया है। उषा 'मर्तस्य देवी' है। मनुष्य को देवता बना देती है। ३. (अवस:) = इस उषा के रक्षण से (तरत्) = सब विघ्नों को पार करता हुआ (सः) = वह ' अवत्सार' (मन्दी) = एक विशेष ही आनन्दयुक्त जीवनवाला बनकर धावति-आगे बढ़ता चलता है। आगे बढ़ने के साथ ही अधिक शुद्ध होता जाता है [धाव्=गति+शुद्धि] |
Essence
प्रातः जागरण से १. हम उत्तमताओं को प्राप्त करें, २. सामान्य मनुष्य की स्थिति से ऊपर उठकर देव बन जाएँ और ३. विघ्नों को तैरते हुए उल्लास के साथ आगे बढ़ते चलें।
Subject
प्रातः जागरण