Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1055

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
त्वां꣢ य꣣ज्ञै꣡र꣢वीवृध꣣न्प꣡व꣢मान꣣ वि꣡ध꣢र्मणि । अ꣡था꣢ नो꣣ व꣡स्य꣢सस्कृधि ॥१०५५॥

त्वा꣢म् । य꣣ज्ञैः꣢ । अ꣣वीवृधन् । प꣡व꣢꣯मान । वि꣡ध꣢꣯र्मणि । वि । ध꣣र्मणि । अ꣡थ꣢꣯ । नः । व꣡स्य꣢꣯सः । कृ꣣धि ॥१०५५॥

Mantra without Swara
त्वां यज्ञैरवीवृधन्पवमान विधर्मणि । अथा नो वस्यसस्कृधि ॥

त्वाम् । यज्ञैः । अवीवृधन् । पवमान । विधर्मणि । वि । धर्मणि । अथ । नः । वस्यसः । कृधि ॥१०५५॥

Samveda - Mantra Number : 1055
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 7; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (पवमान) = हमारे जीवनों को पवित्र करनेवाले प्रभो ! (विधर्मणि) = विशिष्ट धारण के निमित्त, अर्थात् अपना उत्तम धारण करने के लिए 'हिरण्यस्तूप' लोग (त्वाम्) = आपको ही (यज्ञैः) = यज्ञों से (अवीवृधन्) = बढ़ाते हैं । यज्ञों के द्वारा ये लोग आपकी ही उपसाना करते हैं । ('यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवाः') = उस यज्ञरूप प्रभु की देवलोग यज्ञों से ही उपासना करते हैं । हे (पवमान) = प्रभो ! इस प्रकार हमारे जीवनों में यज्ञ की प्रेरणा देकर (अथ नः वस्यसः कृधि) = आप हमारे जीवनों को उत्कृष्ट बनाइए।
Essence
हम यज्ञों द्वारा प्रभु का वर्धन करें और अपने जीवनों को श्रेष्ठ बनाएँ ।
Subject
यज्ञों द्वारा प्रभु का वर्धन