Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1054

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ꣣भ्य꣢३र्षा꣡न꣢पच्युतो꣣ वा꣡जि꣢न्त्स꣣म꣡त्सु꣢ सा꣣स꣢हिः । अ꣡था꣢ नो꣣ व꣡स्य꣢सस्कृधि ॥१०५४॥

अ꣣भि꣢ । अ꣣र्ष । अ꣡न꣢꣯पच्युतः । अ꣢न् । अ꣣पच्युतः । वा꣡जि꣢꣯न् । स꣣म꣡त्सु꣢ । स꣣ । म꣡त्सु꣢꣯ । सा꣣सहिः꣢ । अ꣡थ꣢꣯ । नः꣣ । व꣡स्य꣢꣯सः । कृ꣣धि ॥१०५४॥

Mantra without Swara
अभ्य३र्षानपच्युतो वाजिन्त्समत्सु सासहिः । अथा नो वस्यसस्कृधि ॥

अभि । अर्ष । अनपच्युतः । अन् । अपच्युतः । वाजिन् । समत्सु । स । मत्सु । सासहिः । अथ । नः । वस्यसः । कृधि ॥१०५४॥

Samveda - Mantra Number : 1054
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 7; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
सब दिव्य गुणों की नींव 'धृति' है । विचलित न होना ही तो धर्म के मार्ग पर आक्रमण करना है। स्तुतिनिन्दा, आगम-अपाय व जीवन-मृत्यु यदि हमें विचलित नहीं होने देते तो हम धर्म को अपना पाते हैं। हे प्रभो! आप ही (वाजिन्) = शक्तिशाली हैं। आप ही हमें (अनपच्युतः) = [अच्युत्= अनपच्युत् द्वितीया का बहुवचन] स्थिर वृत्तियों को (अभ्यर्ष) = प्राप्त कराइए | (समत्सु) = कामादि से होनेवाले संग्रामों में आप ही (सासहिः) = शत्रुओं का अत्यन्त पराभव करनेवाले हैं। इनका पराभव करके आप ही (अच्युत) = अविचलित बनाते हैं । हे प्रभो ! (अथ नः वस्यसः कृधि) = इस प्रकार आप हमारे जीवनों को श्रेष्ठ बनाइए । 
Essence
प्रभुकृपा से हम काम संग्राम में विजयी बनकर धर्म मार्ग में अच्युत बनें |
Subject
अनपच्युत्=अविचलित