Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1053

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ꣣꣬भ्य꣢꣯र्ष स्वायुध꣣ सो꣡म꣢ द्वि꣣ब꣡र्ह꣢सꣳ र꣣यि꣢म् । अ꣡था꣢ नो꣣ व꣡स्य꣢सस्कृधि ॥१०५३॥

अ꣣भि꣢ । अ꣣र्ष । स्वायुध । सु । आयुध । सो꣡म꣢꣯ । द्वि꣣ब꣡र्ह꣢सम् । द्वि꣣ । ब꣡र्ह꣢꣯सम् । र꣣यि꣢म् । अ꣡थ꣢꣯ । नः꣣ । व꣡स्य꣢꣯सः । कृ꣣धि ॥१०५३॥

Mantra without Swara
अभ्यर्ष स्वायुध सोम द्विबर्हसꣳ रयिम् । अथा नो वस्यसस्कृधि ॥

अभि । अर्ष । स्वायुध । सु । आयुध । सोम । द्विबर्हसम् । द्वि । बर्हसम् । रयिम् । अथ । नः । वस्यसः । कृधि ॥१०५३॥

Samveda - Mantra Number : 1053
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 7; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
हमारे मनों पर वासनाओं का आक्रमण होता है, परन्तु यदि हम मन में प्रभु का स्मरण करते हैं तो इन वासनाओं का आक्रमण नहीं हो पाता । वे प्रभु 'स्वायुध' हैं - हमारे उत्तम आयुध हैं । प्रभु के द्वारा हम इन कामादि शत्रुओं को पराजित कर पाते हैं । हे (स्वायुध) = हमारे उत्तम आयुधरूप (सोम) = परमात्मन् ! आप हमें (द्विबर्हसम्) = द्युलोक व पृथिवीलोक में-मस्तिष्क व शरीर में (रयिम्) = सम्पत्ति को (अभ्यर्ष) = प्राप्त कराइए । आपकी कृपा से हमें मस्तिष्क की सम्पत्ति 'ज्ञान' तथा शरीर की सम्पत्ति 'बल' दोनों ही प्राप्त हों । हमें 'ब्रह्म व क्षत्र' दोनों ही प्राप्त हों और इस प्रकार हे प्रभो ! (अथ नः वस्यसः कृधि) = आप हमारे जीवनों को उत्कृष्ट बनाइए।
Essence
हम प्रभु को अपना आयुध बनाएँ – शत्रुओं का विनाश करें और अपने 'ब्रह्म' व क्षत्र' का विकास करें ।
Subject
'द्विबर्हस् रयि' =ब्रह्म+क्षत्र