Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1050

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
प꣡वी꣢तारः पुनी꣣त꣢न꣣ सो꣢म꣣मि꣡न्द्रा꣢य꣣ पा꣡त꣢वे । अ꣡था꣢ नो꣣ व꣡स्य꣢सस्कृधि ॥१०५०॥

प꣡वी꣢꣯तारः । पु꣣नीत꣡न꣢ । पु꣣नी꣢त । ꣣न । सो꣡म꣢꣯म् । इ꣡न्द्रा꣢꣯य । पा꣡त꣢꣯वे । अ꣡थ꣢꣯ । नः । व꣡स्य꣢꣯सः । कृ꣣धि ॥१०५०॥

Mantra without Swara
पवीतारः पुनीतन सोममिन्द्राय पातवे । अथा नो वस्यसस्कृधि ॥

पवीतारः । पुनीतन । पुनीत । न । सोमम् । इन्द्राय । पातवे । अथ । नः । वस्यसः । कृधि ॥१०५०॥

Samveda - Mantra Number : 1050
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 7; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(पवीतार:) - हे जीवनों को पवित्र करनेवाले ! (सोमम्) = अपने सोम को (पुनीतन) = पवित्र करो । अपनी वीर्यशक्ति को वासनाओं के नाश द्वारा पवित्र रखने के लिए यत्नशील होओ और इस सोम की पवित्रता के द्वारा (सोमम्) = उस सोम्– ब्रह्माण्ड के उत्पादक प्रभु को (पुनीतन) = देखने में समर्थ Discern बनो । १. (इन्द्राय) = प्रभु-प्राप्ति के लिए या इन्द्रियों के अधिष्ठाता सचमुच इन्द्र बनने के लिए भी सोम को पवित्र करो । ३. (पातवे) = अपने शरीर को रोगादि से सुरक्षित करने के लिए भी सोमपान आवश्यक ही है । इस सोम-पान के बाद ही यह प्रार्थना शोभा देती है कि (अथ नः वस्यसः कृधि) = हमारे जीवनों को उत्कृष्ट बनाओ । बिना सोम-पान के जीवन का उत्कर्ष सम्भव नहीं । 
Essence
हमारा जीवन पवित्र हो । हम जितेन्द्रिय हों, रोगादि से अपनी रक्षा करनेवाले हों ।
Subject
पवित्रता, जितेन्द्रियता, रक्षा