Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1040

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
म꣣हा꣡न्तं꣢ त्वा म꣣ही꣡रन्वापो꣢꣯ अर्षन्ति꣣ सि꣡न्ध꣢वः । य꣡द्गोभि꣢꣯र्वासयि꣣ष्य꣡से꣢ ॥१०४०॥

म꣣हा꣡न्त꣢म् । त्वा꣣ । महीः꣢ । अ꣡नु꣢꣯ । आ꣡पः꣢꣯ । अ꣣र्षन्ति । सि꣡न्ध꣢꣯वः । यत् । गो꣡भिः꣢꣯ । वा꣣सयिष्य꣡से꣢ ॥१०४०॥

Mantra without Swara
महान्तं त्वा महीरन्वापो अर्षन्ति सिन्धवः । यद्गोभिर्वासयिष्यसे ॥

महान्तम् । त्वा । महीः । अनु । आपः । अर्षन्ति । सिन्धवः । यत् । गोभिः । वासयिष्यसे ॥१०४०॥

Samveda - Mantra Number : 1040
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 7; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. (महान्तं त्वा) = महान्, अर्थात् विशाल हृदयवाले तुझे २. (मही: आपः) = महनीय कर्म तथा उन कर्मों के (अनु) = पश्चात्, ३. (सिन्धवः) = स्यन्दमान रेत:कण (अर्षन्ति) = प्राप्त होते हैं । ४. (यत्) = जब तू (गोभिः) =  ज्ञान की किरणों से (वासयिष्यसे) सबको (आच्छादित) = करेगा । 

प्रस्तुत मन्त्र में चार बातें कही गयी हैं – १. मनुष्य को विशाल हृदयवाला बनना चाहिए, २. (महनीय) = प्रशंसनीय कर्मों में लगे रहना चाहिए, ३. बहने के स्वभाववाले (रेतः) = वीर्यकणों की ऊर्ध्वगति के लिए यत्नशील होना चाहिए तथा ४. ज्ञान की प्राप्ति व प्रसार में लगे रहना चाहिए। अपने को भी ज्ञान की किरणों से आच्छादित करे और औरों को भी ज्ञान दे ।
Essence
हम महान् बनें, उदार हृदय हों, प्रशंसनीय कर्मों में लगे रहें।
Subject
हृदय की विशालता