Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 104

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- विश्वमना वैयश्वः Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
न꣡ तस्य꣢꣯ मा꣣य꣡या꣢ च꣣ न꣢ रि꣣पु꣡री꣢शीत꣣ म꣡र्त्यः꣢ । यो꣢ अ꣣ग्न꣡ये꣢ द꣣दा꣡श꣢ ह꣣व्य꣡दा꣢तये ॥१०४॥

न꣢ । त꣡स्य꣢꣯ । मा꣣य꣡या꣢ । च꣣ । न꣢ । रि꣣पुः꣢ । ई꣣शीत । म꣡र्त्यः꣢꣯ । यः । अ꣣ग्न꣡ये꣢ । द꣣दा꣡श꣢ । ह꣣व्य꣡दा꣢तये । ह꣣व्य꣢ । दा꣣तये ॥१०४॥

Mantra without Swara
न तस्य मायया च न रिपुरीशीत मर्त्यः । यो अग्नये ददाश हव्यदातये ॥

न । तस्य । मायया । च । न । रिपुः । ईशीत । मर्त्यः । यः । अग्नये । ददाश । हव्यदातये । हव्य । दातये ॥१०४॥

Samveda - Mantra Number : 104
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 11;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(यः)=जो (अग्नये)=अग्रगति के साधक तथा (हव्यदातये) = [हव्यानां दातिर्दानं येन तस्मै ] उत्तम पदार्थों को देनेवाले प्रभु के लिए (ददाश)=अपने को दे डालता है, अपना समर्पण कर देता है। (तस्य)=उसका (रिपुः) = [ to rip open] नाश कर देनेवाला (मर्त्यः) = यह मार [काम] (मायया) = अपनी पूरी माया के द्वारा भी (चन् ईशीतन) = स्वामी नहीं बन पाता।

मनुष्य संसार में आगे बढ़ने का प्रयत्न करता है, परन्तु उसे पग-पग पर अनुभव होने लगता है कि कोई शक्ति उसे आगे बढ़ने से रोक देती है। यह शक्ति ही यहाँ मन्त्र में 'रिपु ' और ‘मर्त्य' नामों से उल्लिखित हुई हैं। ये ही मनुष्य का शत्रु है - उसका शातन [नाश] करनेवाली हैं।
यह काम ही तेरा शत्रु है। यह मर्त्य है, मार है। अन्त में तेरी समाप्ति का कारण बनताहै।

इसके मारने की प्रक्रिया भी कितनी माया से भरी है ! बड़े ही आकर्षकरूप से वह हमारी ओर आता है और फिर फूलों के धनुषबाण से हमारी सभी ज्ञानेन्द्रियों पर एक साथ आक्रमण करता है। हमें पता भी नहीं लग पाता, पता लगने से पूर्व ही यह अपना काम बड़ी मधुरता से कर चुकता है। हमारे ज्ञान को नष्ट कर [मन्मथ] यह हमें अपना शिकार बना लेता है। इसकी माया से ऊपर उठना मनुष्य की शक्ति से बाहर की बात है।
परन्तु जब मनुष्य प्रभु के प्रति अपना अर्पण कर देता है तो फिर इस काम का कुछ वश नहीं चलता। यह स्मर है, तो प्रभु स्मर-हर हैं। मनुष्यों के ज्ञानदीप को यह काम बुझा देता है, तो प्रभु की ज्ञानाग्नि में यह स्वयं भस्म हो जाता है। मनुष्य के हृदय में प्रभु का स्मरण होते ही इस काम की इतिश्री हो जाती है। मनुष्य पर इसकी माया प्रबल थी, पर प्रभु की तो माया दासी ही है इस प्रकार प्रभु-स्मरण से काम के समाप्त होने पर मनुष्य की वास्तविक उन्नति प्रारम्भ होती है। इसीलिए मन्त्र में प्रभु को 'अग्नि' कहा है- वे हमें आगे ले-चलनेवाले हैं। अब हम आत्मिक उन्नति के मार्ग पर निर्विघ्न हो आगे बढ़ पाते हैं। सांसारिक दृष्टिकोण से भी यह प्रभु का स्मरण घाटे का व्यापार नहीं है। वे प्रभु सब प्रातव्य पदार्थों के देनेवाले हैं। जो-जो वस्तु हमारे लिए उपयोगी है, वह हमें प्राप्त होगी। हमें तो उचित पुरुषार्थ करते चलना है। हमारी आवश्यकताओं की पूर्ति का ध्यान स्वयं प्रभु करेंगे। वे ‘हव्यदाति' हैं।

इस प्रकार काम के नाश से 'हमारा प्रेम का तत्त्व समाप्त हो जाता हो' यह बात नहीं। यह प्रेम संकुचित न रहकर व्यापक हो जाता है, हम सभी के प्रति प्रेमवाले होकर इस मन्त्र के ऋषि ‘विश्वमनाः' बन जाते हैं। अब हमारे ज्ञानेन्द्रियरूपी घोड़े हीनमार्ग पर न जानेवाले होकर उत्कृष्ट मार्ग पर जाते हैं। ये सामान्य घोड़े न होकर विशिष्ट स्थितिवाले होते हैं। इनके स्वामी हम ‘वैयश्व' बन जाते हैं - विशिष्ट अश्वोंवाले।
Essence
प्रभु के प्रति समर्पण द्वारा हम 'विश्वमना वैयश्व' बनें।
Subject
हम विश्वमना वैयश्व बनें