Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1039

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ꣡धु꣢क्षत प्रि꣣यं꣢꣫ मधु꣣ धा꣡रा꣢ सु꣣त꣡स्य꣢ वे꣣ध꣡सः꣢ । अ꣣पो꣡ व꣢सिष्ट सु꣣क्र꣡तुः꣢ ॥१०३९॥

अ꣡धु꣢꣯क्षत । प्रि꣡य꣢म् । म꣡धु꣢꣯ । धा꣡रा꣢꣯ । सु꣣त꣡स्य꣢ । वे꣣ध꣡सः꣢ । अ꣣पः꣢ । व꣣सिष्ट । सुक्र꣡तुः꣢ । सु꣣ । क्र꣡तुः꣢꣯ ॥१०३९॥

Mantra without Swara
अधुक्षत प्रियं मधु धारा सुतस्य वेधसः । अपो वसिष्ट सुक्रतुः ॥

अधुक्षत । प्रियम् । मधु । धारा । सुतस्य । वेधसः । अपः । वसिष्ट । सुक्रतुः । सु । क्रतुः ॥१०३९॥

Samveda - Mantra Number : 1039
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 7; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
‘वेधस्’ सोम का नाम है, क्योंकि शरीर में सब शक्तियों का कर्त्ता [creater] यही है । (सुतस्य वेधसः) = उत्पन्न हुए-हुए सोम की (धारा) = धारणशक्ति (प्रियं मधु) = प्रिय मधु को- तृप्त करनेवाले माधुर्य को (अधुक्षत) = शरीर में दूहती है, अर्थात् जब मनुष्य इस सोम की शरीर में रक्षा करता है तब यह सोम उसके जीवन में माधुर्य का प्रपूरण कर देता है। ('भूयासं मधु सन्दृशः') = इस प्रार्थना को क्रियान्वित करने के लिए आवश्यक है कि हम सोम को अपने में सुरक्षित करें। यह सोम का रक्षक (सुक्रतुः) = उत्तम सङ्कल्पों व प्रज्ञानोंवाला होकर (अप:) = कर्मों को (वसिष्ट) = धारण करता है। सोमी पुरुष का ज्ञान उत्तम होता है—इसके सङ्कल्प उत्तम होते हैं और यह सदा उत्तम कर्मों में व्याप्त रहता है ।
Essence
सोमरक्षा मुझे मधुर जीवनवाला बनाता है, इससे मैं उत्तम सङ्कल्पों व ज्ञानवाला बनता हूँ, क्रियाशील होता हूँ ।
Subject
प्रिय मधु का दोहन