Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1038

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
आ꣡ व꣢च्यस्व꣣ म꣢हि꣣ प्स꣢रो꣣ वृ꣡षे꣢न्दो द्यु꣣म्न꣡व꣢त्तमः । आ꣡ योनिं꣢꣯ धर्ण꣣सिः꣡ स꣢दः ॥१०३८॥

आ । व꣣च्यस्व । म꣡हि꣢꣯ । प्स꣡रः꣢꣯ । वृ꣡षा꣢꣯ । इ꣣न्दो । द्युम्न꣡व꣢त्तमः । आ । यो꣡नि꣢꣯म् । ध꣣र्णसिः꣢ । स꣣दः ॥१०३८॥

Mantra without Swara
आ वच्यस्व महि प्सरो वृषेन्दो द्युम्नवत्तमः । आ योनिं धर्णसिः सदः ॥

आ । वच्यस्व । महि । प्सरः । वृषा । इन्दो । द्युम्नवत्तमः । आ । योनिम् । धर्णसिः । सदः ॥१०३८॥

Samveda - Mantra Number : 1038
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 7; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (इन्दो) = ज्ञानरूप परमैश्वर्य को प्राप्त करनेवाले मेधातिथे ! तू (महिप्सर:) = प्रभु के महनीय रूप का (आवच्यस्व) = निरन्तर कथन कर । प्रभु के स्वरूप का चिन्तन व कीर्तन कर | (वृषा) = शक्तिशाली बन, ३. (द्युम्नवत्तमः) = अधिक-से-अधिक ज्योतिवाला होने का प्रयत्न कर, ४. (धर्णसिः) = धारण करनेवाला— लोगों का हित करनेवाला बनकर तू (योनिम्) = अपने मूल निवासस्थान प्रभु में (आसद:) = आसीन होता है।
Essence
ब्रह्म में स्थित होने के लिए आवश्यक है कि – १. हम प्रभु के महनीय रूप का कथन करें, २. शक्तिशाली बनें, ३. उत्तम ज्ञान प्राप्त करें, ४. लोगों का धारण करनेवाले बनें ।
Subject
ब्राह्म स्थिति