Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1035

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- कश्यपो मारीचः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
शु꣣म्भ꣡मा꣢ना ऋता꣣यु꣡भि꣢र्मृ꣣ज्य꣡मा꣢ना꣣ ग꣡भ꣢स्त्योः । प꣡व꣢न्ते꣣ वा꣡रे꣢ अ꣣व्य꣡ये꣢ ॥१०३५॥

शु꣣म्भ꣡मा꣢नाः । ऋ꣣तायु꣡भिः꣢ । मृ꣣ज्य꣢मा꣢नाः । ग꣡भ꣢꣯स्त्योः । प꣡व꣢꣯न्ते । वा꣡रे꣢꣯ । अ꣣व्य꣡ये꣢ ॥१०३५॥

Mantra without Swara
शुम्भमाना ऋतायुभिर्मृज्यमाना गभस्त्योः । पवन्ते वारे अव्यये ॥

शुम्भमानाः । ऋतायुभिः । मृज्यमानाः । गभस्त्योः । पवन्ते । वारे । अव्यये ॥१०३५॥

Samveda - Mantra Number : 1035
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 7; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. [ऋतेन एति=ऋतायुः] (ऋतायुभिः) = बिलकुल ऋत के अनुसार गति करनेवालों में (शुम्भमाना:) = शोभित किये जाते हुए तथा २. इन्हीं ऋतायु पुरुषों से (गभस्त्योः) = [Sunbeam or moonbeam] ब्रह्मज्ञान की सूर्य किरणों में और विज्ञान की चन्द्र- किरणों में (मृज्यमानाः) = शुद्ध किये जाते हुए ये सोम ३. (अव्यये) = सदा एकरस रहनेवाले - क्षीण न होनेवाले, अक्षर (वारे) = सब दुःखों का निवारण करनेवाले वरणीय प्रभु में (पवन्ते) = प्राप्त करानेवाले होते हैं। 

१. जब मनुष्य अपने जीवन में सब भौतिक क्रियाओं को सूर्य और चन्द्र की भाँति नियमितता से करता है तब वह आहार द्वारा शरीर में उत्पन्न सोम को शरीर में ही सुरक्षित करने में समर्थ होता है और इस सुरक्षित सोम से उसका शरीर कान्ति सम्पन्न हो उठता है [शुम्भमाना: ] । २. इस सोम का विनियोग ज्ञानाग्नि के ईंधन के रूप में होता है और जब तक यह ज्ञान-विज्ञान की प्राप्ति में विनियुक्त हुआ रहता है तब तक शुद्ध व पवित्र बना रहता है— इसे वासनाएँ कलुषित नहीं कर पातीं [मृज्यमानाः] । ३. इस प्रकार ज्ञान-विज्ञान में विनियुक्त सोम प्रभु का दर्शन करानेवाला होता है। ये सोम अविनाशी, दु:ख – तापनिवारक, वरणीय प्रभु में हमारी गति करनेवाले होते हैं। 
Essence
सोम मेरे जीवन में 'शुम्भमान, मृज्यमान तथा पवमान' हों ।
Subject
शुम्भमान-मृज्यमान