Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1029

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- गोतमो राहूगणः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
आ꣡ ति꣢ष्ठ वृत्रह꣣न्र꣡थं꣢ यु꣣क्ता꣢ ते꣣ ब्र꣡ह्म꣢णा꣣ ह꣡री꣢ । अ꣡र्वाची꣢न꣣ꣳ सु꣢ ते꣣ म꣢नो꣣ ग्रा꣡वा꣢ कृणोतु व꣣ग्नु꣡ना꣢ ॥१०२९॥

आ । ति꣣ष्ठ । वृत्रहन् । वृत्र । हन् । र꣡थ꣢꣯म् । यु꣣क्ता꣢ । ते꣣ । ब्र꣡ह्म꣢꣯णा । हरी꣣इ꣡ति꣢ । अ꣣र्वाची꣡न꣢म् । अ꣣र्व । अची꣡न꣢म् । सु । ते꣣ । म꣡नः꣢꣯ । ग्रा꣡वा꣢꣯ । कृ꣣णोतु । वग्नु꣡ना꣢ ॥१०२९॥

Mantra without Swara
आ तिष्ठ वृत्रहन्रथं युक्ता ते ब्रह्मणा हरी । अर्वाचीनꣳ सु ते मनो ग्रावा कृणोतु वग्नुना ॥

आ । तिष्ठ । वृत्रहन् । वृत्र । हन् । रथम् । युक्ता । ते । ब्रह्मणा । हरीइति । अर्वाचीनम् । अर्व । अचीनम् । सु । ते । मनः । ग्रावा । कृणोतु । वग्नुना ॥१०२९॥

Samveda - Mantra Number : 1029
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 7;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रभु ‘गोतम राहूगण = प्रशस्तेन्द्रिय, विषय-त्यागी पुरुष से कहते हैं कि - १. हे (वृत्रहन्) = वासनाओं को विनष्ट करनेवाले! तू (रथम्) = इस शरीररूप रथ पर (आतिष्ठ) = अधिष्ठातृरूपेण आसीन हो । इसपर तेरा शासन हो । २. (ते) = तेरे (हरी) = ये ज्ञानेन्द्रिय व कर्मेन्द्रियरूप अश्व (ब्रह्मणा) = ज्ञान के साथ, अर्थात् बड़ी समझदारी से (युक्ता) = इस शरीरूप रथ में जोते जाएँ। अव्यवस्था के कारण ये रथ को ही न तोड़-फोड़ दें। 

३. (ग्रावा) = उपदेष्टा आचार्य (वग्नुना) = वेदवाणी के द्वारा (ते मन:) = तेरे मन को (सु अर्वाचीनम्) = उत्तमता से अन्दर की ओर ही गतिवाला (कृणोतु) = करे । तेरा मन कहीं विषयों में न भटकता रहे । 
Essence
शरीररूप रथ पर आरूढ़ होकर हम वृत्रहन् बनें – वासनाओं को विनष्ट करें । यात्रा को पूर्ण करने के लिए इन्द्रियाश्वों को प्रेरित करें और प्रयत्न करें कि हमारा मन विषयों में न भटकता रहे । यह प्राचीन न होकर अर्वाचीन बने । बहिर्यात्रा के स्थान में अन्तर्यात्रा करनेवाला हो ।
Subject
अर्वाचीन न कि प्राचीन