Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1027

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- नृमेध आङ्गिरसः Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
वि꣣भ्रा꣢ज꣣न् ज्यो꣡ति꣢षा꣣ स्व꣢३꣱र꣡ग꣢च्छो रोच꣣नं꣢ दि꣣वः꣢ । दे꣣वा꣡स्त꣢ इन्द्र स꣣ख्या꣡य꣢ येमिरे ॥१०२७॥

विभ्रा꣡ज꣢न् । वि꣣ । भ्रा꣡ज꣢꣯न् । ज्यो꣡ति꣢꣯षा । स्वः꣢ । अ꣡ग꣢꣯च्छः । रो꣣चन꣢म् । दि꣣वः꣢ । दे꣣वाः꣢ । ते꣣ । इन्द्र । सख्या꣡य꣢ । स । ख्या꣡य꣢꣯ । ये꣣मिरे ॥१०२७॥

Mantra without Swara
विभ्राजन् ज्योतिषा स्व३रगच्छो रोचनं दिवः । देवास्त इन्द्र सख्याय येमिरे ॥

विभ्राजन् । वि । भ्राजन् । ज्योतिषा । स्वः । अगच्छः । रोचनम् । दिवः । देवाः । ते । इन्द्र । सख्याय । स । ख्याय । येमिरे ॥१०२७॥

Samveda - Mantra Number : 1027
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 7;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (इन्द्र) = सब शत्रुओं का विद्रावण करनेवाले प्रभो ! आप १. (ज्योतिषा) = ज्ञान-ज्योति से (विभ्राजन्) = दीप्ति करते हुए, २. (स्वः) = मोक्ष-सुख को तथा ३. (दिवः रोचनम्) = मस्तिष्करूप द्युलोक की दीप्ति को (अगच्छः) = [अगमयः]=प्राप्त कराते हो । प्रभु वेद-ज्ञान की ज्योति को भक्त के पवित्र हृदय में फैलाते हैं। परिणामतः जहाँ उसका मस्तिष्क अज्ञानान्धकार से रहित होकर ज्ञान के प्रकाश से चमक उठता है वहाँ यह ज्ञानी मोक्ष-सुख का लाभ करता है ।

सर्वैश्वर्यसम्पन्न प्रभो! (देवाः) = देव लोग– दिव्य वृत्तिवाले मनुष्य (ते सख्याय) = तेरी मित्रता के लिए (येमिरे) = अपने जीवनों को संयत बनाते हैं। वे अपने इन्द्रियरूप अश्वों का नियमन करके अपने इस शरीररूप रथ के द्वारा आपके समीप पहुँचने के लिए सदा यत्नशील होते हैं । 
Essence
देव प्रभु की मित्रता के लिए संयत जीवनवाले बनते हैं ।
Subject
प्रभु की मित्रता के लिए