Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1026

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- नृमेध आङ्गिरसः Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
त्व꣡मि꣢न्द्राभि꣣भू꣡र꣢सि꣣ त्व꣡ꣳ सूर्य꣢꣯मरोचयः । वि꣣श्व꣡क꣢र्मा वि꣣श्व꣡दे꣢वो म꣣हा꣡ꣳ अ꣢सि ॥१०२६॥

त्वम् । इ꣣न्द्र । अभिभूः꣢ । अ꣣भि । भूः꣢ । अ꣣सि । त्व꣢म् । सू꣡र्य꣢꣯म् । अ꣣रोचयः । विश्व꣡क꣢र्मा । वि꣣श्व꣢ । क꣣र्मा । विश्व꣡दे꣢वः । वि꣣श्व꣢ । दे꣣वः । महा꣢न् । अ꣣सि ॥१०२६॥

Mantra without Swara
त्वमिन्द्राभिभूरसि त्वꣳ सूर्यमरोचयः । विश्वकर्मा विश्वदेवो महाꣳ असि ॥

त्वम् । इन्द्र । अभिभूः । अभि । भूः । असि । त्वम् । सूर्यम् । अरोचयः । विश्वकर्मा । विश्व । कर्मा । विश्वदेवः । विश्व । देवः । महान् । असि ॥१०२६॥

Samveda - Mantra Number : 1026
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 7;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
जो व्यक्ति केवल स्वार्थमय निजी जीवन नहीं बिताता, अपितु जिसका जीवन समष्टि के साथ मिलकर चलता है, वह सब नरों के साथ मेल करनेवाला 'नृमेध' कहता है कि—१. हे (इन्द्र) = परमैश्वर्यशाली प्रभो ! (त्वम्) = आप ही (अभिभूः असि) = सब बुराइयों का अभिभव करनेवाले हैं। वस्तुतः नृमेध समाजहित के कर्मों में लगा हुआ यह गर्व नहीं करता कि वह बुराइयों को दूर करने में लगा है, अपितु वह तो यही भावना रखता है कि सब बुराइयों को दूर करनेवाले तो वे प्रभु ही हैं। २. हे प्रभो ! (त्वम्) = आप ही (सूर्यम्) = ज्ञान के सूर्य को (अरोचयः) = चमकाते हैं । नृमेध प्रजाओं में ज्ञान का विस्तार करता हुआ यही समझता है कि यह ज्ञान - सूर्य उस प्रभु से ही दीप्त किया जा रहा है । ३. हे प्रभो ! विश्वकर्मा=ये सब कार्य आपकी ही शक्ति से हो रहे हैं । ४. विश्वदेवः = सब दिव्य गुण आपके ही हैं । ५. महान् असि-आप सचमुच महान् हैं—पूज्य हैं। इस प्रकार प्रभु-स्तवन करता हुआ यह नृमेध अपने में किसी प्रकार के गर्व को नहीं आने देता ।
Essence
इस संसार में जो कुछ अच्छाई व उत्तमता है, वह सब उस प्रभु की ही है। 
Subject
नृमेध का प्रभु-स्तवन