Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1024

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- वसुश्रुत आत्रेयः Chhand- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
ओ꣡भे सु꣢꣯श्चन्द्र विश्पते꣣ द꣡र्वी꣢ श्रीणीष आ꣣स꣡नि꣢ । उ꣣तो꣢ न꣣ उ꣡त्पु꣢पूर्या उ꣣क्थे꣡षु꣢ शवसस्पत꣣ इ꣡ष꣢ꣳ स्तो꣣तृ꣢भ्य꣣ आ꣡ भ꣢र ॥१०२४॥

आ꣢ । उ꣣भे꣡इति꣣ । सु꣣श्चन्द्र । सु । चन्द्र । विश्पते । द꣢र्वी꣢꣯इ꣡ति꣢ । श्री꣣णीषे । आस꣡नि꣢ । उ꣣त꣢ । उ꣣ । नः । उ꣣त् । पु꣣पूर्याः । उक्थे꣡षु꣢ । श꣣वसः । पते । इ꣡ष꣢꣯म् । स्तो꣣तृ꣡भ्यः꣢ । आ । भ꣣र ॥१०२४॥

Mantra without Swara
ओभे सुश्चन्द्र विश्पते दर्वी श्रीणीष आसनि । उतो न उत्पुपूर्या उक्थेषु शवसस्पत इषꣳ स्तोतृभ्य आ भर ॥

आ । उभेइति । सुश्चन्द्र । सु । चन्द्र । विश्पते । दर्वीइति । श्रीणीषे । आसनि । उत । उ । नः । उत् । पुपूर्याः । उक्थेषु । शवसः । पते । इषम् । स्तोतृभ्यः । आ । भर ॥१०२४॥

Samveda - Mantra Number : 1024
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 7;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
('पुरुषो वाव यज्ञः') इस वाक्य के अनुसार मानव जीवन एक यज्ञ है, उसमें 'ज्ञानेन्द्रियाँ और कर्मेन्द्रियाँ' दो कड़छियों के समान है। अथर्व० १०.७.१९ के अनुसार 'यस्य ब्रह्म मुखमाहुः' ब्रह्म, अर्थात् ज्ञान ही उस प्रभु का मुख है । श्रुतरूपी धनवाला 'वसुश्रुत' प्रस्तुत मन्त्र का ऋषि है, यह ज्ञान, कर्म व उपासना तीनों की ओर [त्रि] चलने [अत्] के कारण अत्रि व आत्रेय कहलाता है। । 4

यह 'वसुश्रुत आत्रेय' प्रार्थना करता है कि हे (सुश्चन्द्र) = उत्तम आह्लाद प्राप्त करानेवाले ! (विश्पते) = सब प्रजाओं के पालक प्रभो! आप (उभे) = दोनों (दर्वी) = ज्ञानेन्द्रिय व कर्मेन्द्रियरूप पुरुषयज्ञ की दर्वियों को (आसनि) = ज्ञानरूप अपने मुख में (आश्रीणीषे) = समन्तात् परिपक्व कर डालते हैं । ज्ञानेन्द्रियाँ व कर्मेन्द्रियाँ वेदज्ञानरूप अग्नि में परिपक्व होकर मलिनतारहित-सी 'Disinfected' हो जाती हैंउनके मलरूप सभी कृमि नष्ट हो जाते हैं और परिणामतः विषयरूप रोगों की आशंका नहीं रह जाती ।

हे (शवसस्पते) = सब बलों के स्वामिन् प्रभो ! (उत उक्थेषु) = और स्तोत्रों के विषयों में भी (नः) = हमें (उत्पुपूर्या:) = ऊपर तक भर दीजिए । स्तोत्रों का तो हमारे जीवन में परीवाह [overflowinng] होने लगे। 

अब ज्ञान और कर्म के सुन्दर परिपाकवाले तथा स्तोत्रों के परीवाहवाले (स्तोतृभ्यः) = अपने स्तोताओं के लिए (इषम्) = सदा अपनी उत्तम प्रेरणा (आभर) = प्राप्त कराइए । आपकी प्रेरणा ही तो इस ज्ञान के धनी वसुश्रुत को आत्रेय - ज्ञानी बनाएगी। ज्ञान, कर्म व उपासना का अपने में समन्वय करनेवाला यह ‘वसुश्रुत आत्रेय' धर्मार्थकामरूप तीनों पुरुषार्थों का भी सुन्दर समन्वय करके श्रीसम्पन्न बनेगा।
Essence
ज्ञानाग्नि में हम अपनी इन्द्रियों को परिपक्क करें तथा हृदयों को प्रभु-भक्ति से भर लें।
Subject
तीनों की ओर चलनेवाला