Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1018

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- रेभसूनू काश्यपौ Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
त्वं꣡ द्यां च꣢꣯ महिव्रत पृथि꣣वीं꣡ चाति꣢꣯ जभ्रिषे । प्र꣡ति꣢ द्रा꣣पि꣡म꣢मुञ्चथाः प꣡व꣢मान महित्व꣣ना꣢ ॥१०१८॥

त्वम् । द्याम् । च꣣ । महिव्रत । महि । व्रत । पृथिवी꣢म् । च꣣ । अ꣡ति꣢꣯ । ज꣣भ्रिषे । प्र꣡ति꣢꣯ । द्रा꣣पि꣢म् । अ꣣मुञ्चथाः । प꣡व꣢꣯मान । म꣣हित्वना꣢ ॥१०१८॥

Mantra without Swara
त्वं द्यां च महिव्रत पृथिवीं चाति जभ्रिषे । प्रति द्रापिममुञ्चथाः पवमान महित्वना ॥

त्वम् । द्याम् । च । महिव्रत । महि । व्रत । पृथिवीम् । च । अति । जभ्रिषे । प्रति । द्रापिम् । अमुञ्चथाः । पवमान । महित्वना ॥१०१८॥

Samveda - Mantra Number : 1018
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 6;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. हे (महिव्रत) = महनीय [प्रशंसनीय] व महान् व्रतोंवाले (पवमान) = सबको पवित्र करनेवाले प्रभो ! (त्वम्) = आप (द्यां च पृथिवीं च) = द्युलोक व पृथिवीलोक को (अतिजभिषे) = अतिशयेन धारण करते हो - बहुत ही सुन्दर ढंग से सारे संसार का पालन-पोषण करते हो । २. हे (पवमान) प्रभो ! (महित्वना) = आप अपनी महिमा से (द्रापिम्) = कुत्सित गति को [द्रा कुत्सायां गतौ] प्रति (अमुञ्चथाः) = छुड़ाते हो- दूर करते हो ।

२. १. प्रभु के कर्म महान् हैं । वे 'महिव्रत' हैं— सारे ब्रह्माण्ड का पालन उसका सर्वमहान् कर्म है । वे प्रभु पवमान हैं—पवित्र करनेवाले हैं। वे अपनी महिमा से भक्तों को अशुभों से दूर करते हैं । प्रभु का भक्त [रेभ] प्रभु की प्रेरणा को सुनता है [सूनु] और ज्ञानी [काश्यप] बनकर पवित्र कर्मोंवाला हो जाता है ।
Essence
प्रभु ही सबका धारण करते हैं। हमारा धारण भी वही करेंगे और हमें पाप से पृथक् करेंगे।
Subject
पवमान-महिव्रत
Footnote
सूचना – ‘प्रभु धारण करते हैं और कुत्सित गति को दूर करते हैं', इस मन्त्र क्रम के द्वारा यह सूचना हो रही है कि पापों से पृथक् होने के लिए आवश्यक है कि हम निर्माण व धारण के कार्यों में लगे रहें । संक्षेप में 'पवमान' वही बनता है जो 'महिव्रत' होता है ।