Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1017

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- रेभसूनू काश्यपौ Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
त्वा꣡ꣳ रि꣢꣯हन्ति धी꣣त꣢यो꣣ ह꣡रिं꣢ प꣣वि꣡त्रे꣢ अ꣣द्रु꣡हः꣢ । व꣣त्सं꣢ जा꣣तं꣢꣫ न मा꣣त꣢रः꣣ प꣡व꣢मा꣣न वि꣡ध꣢र्मणि ॥१०१७॥

त्वाम् । रि꣣हन्ति । धीत꣡यः꣢ । ह꣡रि꣢꣯म् । प꣣वि꣡त्रे꣢ । अ꣣द्रु꣡हः꣢ । अ꣣ । द्रु꣡हः꣢꣯ । व꣡त्स꣢म् । जा꣣त꣢म् । न । मा꣣त꣡रः꣢ । प꣡वमा꣢꣯न । वि꣡ध꣢꣯र्मणि । वि । ध꣣र्मणि ॥१०१७॥

Mantra without Swara
त्वाꣳ रिहन्ति धीतयो हरिं पवित्रे अद्रुहः । वत्सं जातं न मातरः पवमान विधर्मणि ॥

त्वाम् । रिहन्ति । धीतयः । हरिम् । पवित्रे । अद्रुहः । अ । द्रुहः । वत्सम् । जातम् । न । मातरः । पवमान । विधर्मणि । वि । धर्मणि ॥१०१७॥

Samveda - Mantra Number : 1017
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 6;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (पवमान) = हमारे जीवनों को पवित्र करनेवाले प्रभो ! (हरिम्) = सब दुःखों व पापों के हरनेवाले (त्वाम्) = आपको (पवित्रे) = वासनाओं से शून्य - निर्मल हृदय में (धीतयः) = ध्यानशील, (अद्रुहः) = किसी का द्रोह न करनेवाले, (मातरः) = सदा निर्माण के कार्यों में लगे हुए (रिहन्ति) = पूजते हैं [नि० ३.१४.११], आपके दर्शन का रसास्वादन करते हैं, उसी प्रकार (न) = जैसे (जातं वत्सम्) = उत्पन्न हुए हुए वत्स को देखकर (मातर:) = माताएँ (रिहन्ति) = आनन्दित होती हैं। ये लोग प्रभु का इस प्रकार अर्चन इसलिए करते हैं कि (विधर्मणि) = विशिष्टरूप से अपना धारण कर सकें। जीवन में वासनाओं का सतत आक्रमण हो रहा है, उस आक्रमण से प्रभु-चिन्तन ही मनुष्य को बचाता है । इस धारण के निमित्त वे प्रभु का ध्यान करते हैं ।

एवं, यह प्रभु का अर्चन करनेवाला 'रेभ' - स्तोता है, प्रभु - प्रेरणा को सुनने के कारण 'सूनू' और वासना - विनाश के कारण यह 'काश्यप ' ज्ञानी तो है ही।
 
Essence
हम ध्यान, अद्रोह व निर्माण के द्वारा प्रभु का पूजन करें। वे हमारे पापों को हरेंगे और विशिष्टरूप से हमारा धारण करेंगे ।
Subject
ध्यान, अद्रोह, निर्माण