Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1016

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- रेभसूनू काश्यपौ Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
प꣡व꣢स्व꣣ वा꣡ज꣢सातये प꣣वि꣢त्रे꣣ धा꣡र꣢या सु꣣तः꣢ । इ꣡न्द्रा꣢य सोम꣣ वि꣡ष्ण꣢वे दे꣣वे꣢भ्यो꣣ म꣡धु꣢मत्तरः ॥१०१६॥

प꣡व꣢꣯स्व । वा꣡ज꣢꣯सातये । वा꣡ज꣢꣯ । सा꣣तये । पवि꣡त्रे꣢ । धा꣡र꣢꣯या । सु꣣तः꣢ । इ꣡न्द्रा꣢꣯य । सो꣣म । वि꣡ष्ण꣢꣯वे । दे꣣वे꣡भ्यः꣢ । म꣡धु꣢꣯मत्तरः ॥१०१६॥

Mantra without Swara
पवस्व वाजसातये पवित्रे धारया सुतः । इन्द्राय सोम विष्णवे देवेभ्यो मधुमत्तरः ॥

पवस्व । वाजसातये । वाज । सातये । पवित्रे । धारया । सुतः । इन्द्राय । सोम । विष्णवे । देवेभ्यः । मधुमत्तरः ॥१०१६॥

Samveda - Mantra Number : 1016
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 6;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (सोम) = सम्पूर्ण जगत् को उत्पन्न करनेवाले प्रभो ! १. आप (वाजसातये) = संग्राम [नि० २.१६.३६] के लिए (पवस्व) = हमें प्राप्त हों । आपके सहाय के बिना हम वासनाओं के साथ संग्राम में जीत नहीं सकते। २. (पवित्रे) = वासना-विजय से पवित्र हुए हुए हृदय में (धारया) = वेदवाणी के द्वारा आप (सुतः) = उत्पन्न होते हैं। सर्वव्यापकता के नाते हमारे हृदयों में भी स्थित प्रभु का दर्शन वासनाओं के विनाश से पवित्र होने पर ही होता है । प्रभु ('बर्हि') = उसी हृदय में बैठते हैं, जहाँ से वासनाओं का उद्बर्हण कर दिया गया है । ३. हे सोम ! आप (इन्द्राय) = इन्द्रियों के अधिष्ठाता (विष्णवे) = व्यापक मनोवृत्तिवाले, उदार (देवेभ्यः) = दिव्य गुणों से युक्त पुरुषों के लिए (मधुमत्तरः) = अत्यन्त माधुर्यवाले होते हो। प्रभु ‘इन्द्र, विष्णु व देव' पुरुष के जीवन को अत्यन्त मधुर बना देते हैं ।
Essence
हम प्रभु के साहाय्य से वासना-संग्राम में विजयी हों, पवित्र हृदय में वेदवाणी के प्रकाश से प्रभु का दर्शन करें। जितेन्द्रिय हों, व्यापक मनोवृत्तिवाले हों, देव बनें, जिससे प्रभु हमारे जीवनों को मधुर बना दें।
Subject
जीवन का माधुर्य