Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 1003

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- गोतमो राहूगणः Chhand- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
अ꣢सि꣣ हि꣡ वी꣢र꣣ से꣢꣫न्योऽसि꣣ भू꣡रि꣢ पराद꣣दिः꣢ । अ꣡सि꣢ द꣣भ्र꣡स्य꣢ चिद्वृ꣣धो꣡ यज꣢꣯मानाय शिक्षसि सुन्व꣣ते꣡ भूरि꣢꣯ ते꣣ व꣡सु꣢ ॥१००३॥

अ꣡सि꣢꣯ । हि । वी꣣र । से꣡न्यः꣢꣯ । अ꣡सि꣢꣯ । भू꣡रि꣢꣯ । प꣣राददिः꣢ । प꣣रा । ददिः꣢ । अ꣡सि꣢꣯ । द꣣भ्र꣡स्य꣢ । चि꣣त् । वृधः꣢ । य꣡ज꣢꣯मानाय । शि꣣क्षसि । सुन्वते꣢ । भू꣡रि꣢꣯ । ते । व꣡सु꣢꣯ ॥१००३॥

Mantra without Swara
असि हि वीर सेन्योऽसि भूरि पराददिः । असि दभ्रस्य चिद्वृधो यजमानाय शिक्षसि सुन्वते भूरि ते वसु ॥

असि । हि । वीर । सेन्यः । असि । भूरि । पराददिः । परा । ददिः । असि । दभ्रस्य । चित् । वृधः । यजमानाय । शिक्षसि । सुन्वते । भूरि । ते । वसु ॥१००३॥

Samveda - Mantra Number : 1003
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 5;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
१. प्रभु ‘गोतमराहूगण' प्रशस्तेन्द्रिय त्यागशील व्यक्ति से कहते हैं कि हे (वीर) = शत्रुओं को विशेषरूप से कम्पित करनेवाले ! तू हि निश्चय से (सेन्यः) = [इनेन सहिताः सेनाः, तेषु साधु] प्रभु के साथ सम्पर्क रखनेवालों में उत्तम असि है । वस्तुतः प्रातः सायं प्रभु का स्मरण करने के कारण ही तो यह वीर है । २. प्रभु-सम्पर्क जनित बल से (पराददिः असि) = शत्रुओं का पराजेता व दूर भगानेवाला है। ३. प्रभु के सम्पर्क के कारण ही (दभ्रस्य) = अल्प का (चित्) = भी (वृधः असि) = बढ़ानेवाला है। हृदय जोकि सामान्यतः तंग-सा होता है, प्रभु-स्मरण से विशाल बन जाता है । ४. हृदय के विशाल बनने पर तू (यजमानाय) = यज्ञशील पुरुष के लिए तथा (सुन्वते) = निर्माणात्मक कार्यों में लगे हुए पुरुष के लिए ते वसु-अपने धन को भूरि (शिक्षसि) = खूब और खूब ही देता है । 
Essence
प्रभु-सम्पर्क में रहते हुए हम शत्रुओं के पराजेता बनें ।
Subject
सेन्य व पराददि