Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

Samveda Mantra 100

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- विश्वामित्रो गाथिनः Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
अ꣢ग्ने꣣ य꣡जि꣢ष्ठो अध्व꣣रे꣢ दे꣣वा꣡न् दे꣢वय꣣ते꣡ य꣢ज । हो꣡ता꣢ म꣣न्द्रो꣡ वि रा꣢꣯ज꣣स्य꣢ति꣣ स्रि꣡धः꣢ ॥१००॥

अ꣡ग्ने꣢꣯ । य꣡जि꣢꣯ष्ठः । अ꣣ध्वरे꣢ । दे꣣वा꣢न् । दे꣣वयते꣢ । य꣣ज । हो꣡ता꣢꣯ । म꣣न्द्रः꣢ । वि । रा꣣जसि । अ꣡ति꣢꣯ । स्रि꣡धः꣢꣯ ॥१००॥

Mantra without Swara
अग्ने यजिष्ठो अध्वरे देवान् देवयते यज । होता मन्द्रो वि राजस्यति स्रिधः ॥

अग्ने । यजिष्ठः । अध्वरे । देवान् । देवयते । यज । होता । मन्द्रः । वि । राजसि । अति । स्रिधः ॥१००॥

Samveda - Mantra Number : 100
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 11;

Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Pandit Harisharan Siddhantalankar) - हिन्दी
Meaning
(अग्ने)=आगे ले-चलनेवाले प्रभो ! (अध्वरे) = हिंसारहित यज्ञरूप उत्तम कर्मों में (यजिष्ठ)= सर्वोत्तम सङ्गत करनेवाले तो आप ही हो, परन्तु प्रभु भी उसी को उत्तम मार्ग पर ले-चलते हैं जो स्वयं दिव्य गुणों की प्राप्ति की कामनावाला हो । प्रभु का द्वार तो खुलेगा, पर जीव को थपथपाना तो होगा। प्रभु की कृपारूपी वायु हमारे मनरूप नाव को चलाएगी तो सही पर हमें नाव के बादवानों को खोलना होगा । इसीलिए मन्त्र में कहते हैं कि (देवयते) = दिव्य गुणों को अपनाने की कामनावाले मेरे लिए आप (देवान्) = दिव्य गुणों को (यज)=सङ्गत कराइए।

जीव की प्रार्थना को सुनकर प्रभु जीव से कहते हैं कि (होता) = तू दानपूर्वक अदन [भक्षण] करनेवाला बन । तू सदा यज्ञशेष का सेवन करनेवाला हो । यही तेरे लिए 'अमृत' है। इस अमृत के सेवन से तेरी सब अशुभ वृत्तियाँ मृत हो जाएँगी।

(मन्द्रः)=तेरी मनोवृत्ति सदा प्रसन्नतावाली हो। मनःप्रसाद ही सर्वोत्तम तप है। होता बनने से तू मन्द्र भी बन पाएगा | तेरे चेहरे पर कभी क्रोध न हो, तुझसे प्रसाद का प्रवाह चारों ओर प्रवाहित हो।

(स्त्रिधः)=हानि पहुँचाने की भावनाओं से [स्त्रिध् to injure] तेरा जीवन अति = परे हो । इन भावनाओं को तू लाँघ चुका हो। कोई तेरा अपमान करे, तुझे हानि पहुँचाए, उसके लिए भी तेरी मङ्गलकामना हो । तू सभी को अपने परमपिता प्रभु का पुत्र समझता हुआ द्वेष से शून्य हो ।
संक्षेप में तू सभी के साथ स्नेह करनेवाला इस मन्त्र का ऋषि ‘विश्वामित्र' बन। तभी यह दानशीलता, सदा प्रसन्नता तथा अहिंसारूप सम्पत्-त्रयी तुझे प्राप्त होगी। और विराजसि-तू इस संसार में विशेष शोभावाला होगा, तेरा जीवन चमक उठेगा।
Essence
हम होता बनें, सदा प्रसन्न रहें और अपकारी को हानि पहुँचाने की भावना को भी अपने से दूर रक्खें ।
Subject
दैवी - सम्पत्-त्रयी