Samveda Bhashyam (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 1

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
अ꣢ग्न꣣ आ꣡ या꣢हि वी꣣त꣡ये꣢ गृणा꣣नो꣢ ह꣣व्य꣡दा꣢तये । नि꣡ होता꣢꣯ सत्सि ब꣣र्हि꣡षि꣢ ॥१॥

अ꣡ग्ने꣢꣯ । आ । या꣣हि । वीत꣡ये꣢ । गृ꣣णानः꣢ । ह꣣व्य꣡दा꣢तये । ह꣣व्य꣢ । दा꣣तये । नि꣢ । हो꣡ता꣢꣯ । स꣣त्सि । बर्हि꣡षि꣢ ॥१॥

Mantra without Swara
अग्न आ याहि वीतये गृणानो हव्यदातये । नि होता सत्सि बर्हिषि ॥

अग्ने । आ । याहि । वीतये । गृणानः । हव्यदातये । हव्य । दातये । नि । होता । सत्सि । बर्हिषि ॥१॥

Samveda - Mantra Number : 1
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Acharya Ramnath Vedalankar)

संस्कृत
Samveda Bhashyam (Acharya Ramnath Vedalankar) - संस्कृत
Meaning
१. हे (अग्ने)=' आगे ले चलनेवाले' प्रभो! आपका 'अग्नि' नाम ही वेद में सबसे अधिक बार आया है। यह मानव-जीवन के लक्ष्य का संकेत कर रहा है कि 'तुझे मोक्ष तक पहुँचना है, पहुँचेगा प्रभु की कृपा से', अतः वह प्रार्थना करता है- हे प्रभो! आप (आयाहि) आइए और (वीतये) = हमारे हृदय - अन्धकार का ध्वंस कर दीजिए [वी= असन = परे फेंक देना]। उस प्रभु के प्रकाश में वृत्र का अन्धकार कहाँ? उस ज्योति में तो काम भस्मीभूत हो जाता है।
२. (गृणान:) = [गृणाति आह्वयति भक्तान् कल्याणवर्त्मनि] हमें कल्याण के मार्ग का उपदेश देते हुए (हव्य-दातये)= प्रीणयितव्य [हु प्रीणनार्थोऽपि] भक्तों के कर्म-बन्धनों के उच्छेद के लिए होओ। जो भक्त नहीं वे तो प्रभु का आह्वान सुनने ही क्यों लगे हैं? हव्य वे जीव हैं जो प्रभु में श्रद्धा से उसके कृपापात्र बनते हैं।
३. (होता)=महान् उपदेशक प्रभो ! [ ह्वेञ् शब्दे] (बर्हिषि) = [ब+इस्= नष्ट करना] जिसमें वासना व अज्ञान का अन्धकार नष्ट हो गया है, उस हृदयान्तरिक्ष में आप (नि सत्सि)=निरन्तर विराजमान होते हैं। सर्वव्यापक प्रभु का दर्शन पवित्र हृदय में ही होता है।
आपके साक्षात्कार से, आपके सम्पर्क में आकर, शक्तिसम्पन्न बनकर, मैं इस मन्त्र का ऋषि ‘भरद्वाज'=' अपने में शक्ति को भरनेवाला' बन पाऊँ।
Essence
हृदय में प्रभु का प्रकाश होते ही अन्धकार नष्ट हो जाता है। इस प्रकाशमय हृदय में सन्मार्ग की प्रेरणा देते हुए प्रभु भक्तों के कर्म-बन्धनों का उच्छेद करते हैं। वासनाशून्य हृदय में ही उस महोपदेशक की प्रेरणा सुनाई देती है।
 
Subject
प्रकाश 'अन्धकार का नाश'