Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 996

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- भृगुर्वारुणिर्जमदग्निर्भार्गवो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
इ꣡षं꣢ तो꣣का꣡य꣢ नो꣣ द꣡ध꣢द꣣स्म꣡भ्य꣢ꣳ सोम वि꣣श्व꣡तः꣢ । आ꣡ प꣢वस्व सह꣣स्रि꣡ण꣢म् ॥९९६॥

इ꣡ष꣢꣯म् । तो꣣का꣡य꣢ । नः꣣ । द꣡ध꣢꣯त् । अ꣣स्म꣢भ्य꣢म् । सो꣣म । विश्व꣡तः꣢ । आ । प꣣वस्व । सहस्रि꣡ण꣢म् ॥९९६॥

Mantra without Swara
इषं तोकाय नो दधदस्मभ्यꣳ सोम विश्वतः । आ पवस्व सहस्रिणम् ॥

इषम् । तोकाय । नः । दधत् । अस्मभ्यम् । सोम । विश्वतः । आ । पवस्व । सहस्रिणम् ॥९९६॥

Samveda - Mantra Number : 996
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 4;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(सोम) हे शान्तस्वरूप परमात्मन्! (नः-तोकाय-इषं दधत्) हमारे सन्तान के लिए लौकिक कमनीय वस्तु को धारण कराता हुआ (अस्मभ्यं सहस्रिणं विश्वतः-आपवस्व) हम उपासकों के लिए सहस्रगुणित—सहस्रों में ऊँची कमनीय वस्तु मोक्ष-ऐश्वर्य सब प्रकार से समस्त क्रियाकलाप के फलरूप प्राप्त करा। मोक्ष-सुख या अध्यात्मसम्पदा तभी प्राप्त होती है जब पुत्र की लौकिक कमनीय निर्वाहक वस्तु पिता प्रदान कर जावे उसके लिए प्रार्थना है॥३॥
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