Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 97

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
पु꣣रु꣡ त्वा꣢ दाशि꣣वा꣡ꣳ वो꣢चे꣣ऽरि꣡र꣢ग्ने꣣ त꣡व꣢ स्वि꣣दा꣢ । तो꣣द꣡स्ये꣢व शर꣣ण꣢꣫ आ म꣣ह꣡स्य꣢ ॥९७॥

पु꣣रु꣢ । त्वा꣣ । दाशिवा꣢न् । वो꣣चे । अरिः꣢ । अ꣣ग्ने । त꣡व꣢꣯ । स्वि꣣त् । आ꣢ । तो꣣द꣡स्य꣢ । इ꣣व शरणे꣢ । आ । म꣣ह꣡स्य꣢ ॥९७॥

Mantra without Swara
पुरु त्वा दाशिवाꣳ वोचेऽरिरग्ने तव स्विदा । तोदस्येव शरण आ महस्य ॥

पुरु । त्वा । दाशिवान् । वोचे । अरिः । अग्ने । तव । स्वित् । आ । तोदस्य । इव शरणे । आ । महस्य ॥९७॥

Samveda - Mantra Number : 97
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 11;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(अग्ने) हे जीवन प्रगतिदाता परमात्मन्! (पुरुदाशिवान्) मैं बहुत प्रकार से अपने आत्मा का दानी—स्वात्मसमर्पी (त्वा-आ वोचे) तुझ से ही समन्तरूप से प्रार्थना करता हूँ, क्योंकि (अरिः) तू ही स्वामी है “ईश्वरोऽप्यरिः” [निरु॰ ५.८] (तोदस्य-इव तव महस्य शरणे स्वित्-आ) तुझ महान् प्रेरक—आज्ञादाता गृहस्वामी के शरण में—आश्रय में भृत्य की भाँति आ पहुँचूँ, ऐसा सङ्कल्प है।
Essence
हे परमात्मन्! मैं तेरे प्रति आत्मसमर्पण कर निरन्तर प्रार्थना करता हूँ कि तुझ महान् गृहस्वामी की शरण में भृत्य की भाँति मैं आजाऊँ तेरा कृपापात्र बन जाऊँ॥१॥
Special
छन्दः—उष्णिक् । स्वरः—ऋषभः। ऋषिः—दीर्घतमाः (आयु को चाहनेवाला—मुक्ति के जीवन को चाहनेवाला उपासक)॥