Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 934

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- पुरुहन्मा आङ्गिरसः Chhand- प्रगाथः(विषमा बृहती, समा सतोबृहती) Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
इ꣢न्द्रं꣣ त꣡ꣳ शु꣢म्भ पुरुहन्म꣣न्न꣡व꣢से꣣ य꣡स्य꣢ द्वि꣣ता꣡ वि꣢ध꣣र्त्त꣡रि꣢ । ह꣡स्ते꣢न꣣ व꣢ज्रः꣣ प्र꣡ति꣢ धायि दर्श꣣तो꣢ म꣣हा꣢न् दे꣣वो꣡ न सूर्यः꣢꣯ ॥९३४॥

इ꣡न्द्र꣢꣯म् । तम् । शु꣣म्भ । पुरुहन्मन् । पुरु । हन्मन् । अ꣡व꣢꣯से । य꣡स्य꣢꣯ । द्वि꣣ता꣢ । वि꣣ध꣡र्तरि꣢ । वि꣣ । धर्त꣡रि꣢ । ह꣡स्ते꣢꣯न । व꣡ज्रः꣢꣯ । प्र꣡ति꣢꣯ । धा꣣यि । दर्श꣢तः । म꣣हा꣢न् । दे꣣वः꣢ । न । सू꣡र्यः꣢꣯ ॥९३४॥

Mantra without Swara
इन्द्रं तꣳ शुम्भ पुरुहन्मन्नवसे यस्य द्विता विधर्त्तरि । हस्तेन वज्रः प्रति धायि दर्शतो महान् देवो न सूर्यः ॥

इन्द्रम् । तम् । शुम्भ । पुरुहन्मन् । पुरु । हन्मन् । अवसे । यस्य । द्विता । विधर्तरि । वि । धर्तरि । हस्तेन । वज्रः । प्रति । धायि । दर्शतः । महान् । देवः । न । सूर्यः ॥९३४॥

Samveda - Mantra Number : 934
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 5;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(पुरुहन्मन्) हे दोषों के अत्यन्त नाशक उपासक! तू (तम्-इन्द्रम्-अवसे शुम्भ) उस ऐश्वर्यवान् परमात्मा को अपने रक्षण के लिए बोल—प्रार्थित कर*81 (यस्य विधर्तरि द्विता) जिस विशेषधकर्ता इन्द्र—ऐश्वर्यवान् परमात्मा में दो धर्म हैं भोग और अपवर्ग प्रदान करना या दण्ड और पुरस्कार देना (हस्तेन वज्रः प्रतिधायि) हस्त से वज्र प्रतिधान करना (महान् दर्शतः-देवः-न सूर्यः) दर्शनीय महान् देव सूर्य के समान है। सूर्य अन्धकार को नष्ट करता और प्रकाश को फैलाता है ऐसा परमात्मा उपासक की वासना को मिटाता है और शान्ति को बढ़ाता है॥२॥
Footnote
[*81. “शुम्भ भाषणे” [भ्वादि॰]।]
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