Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 914

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- गोतमो राहूगणः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
इ꣣च्छ꣡न्नश्व꣢꣯स्य꣣ य꣢꣫च्छिरः꣣ प꣡र्व꣢ते꣣ष्व꣡प꣢श्रितम् । त꣡द्वि꣢दच्छर्य꣣णा꣡व꣢ति ॥९१४॥

इ꣡च्छ꣢न् । अ꣡श्व꣢꣯स्य । यत् । शि꣡रः꣢꣯ । प꣡र्वते꣢꣯षु । अ꣡प꣢꣯श्रितम् । अ꣡प꣢꣯ । श्रि꣣तम् । त꣢त् । वि꣣दत् । शर्यणा꣡व꣢ति ॥९१४॥

Mantra without Swara
इच्छन्नश्वस्य यच्छिरः पर्वतेष्वपश्रितम् । तद्विदच्छर्यणावति ॥

इच्छन् । अश्वस्य । यत् । शिरः । पर्वतेषु । अपश्रितम् । अप । श्रितम् । तत् । विदत् । शर्यणावति ॥९१४॥

Samveda - Mantra Number : 914
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 3;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(अश्वस्य) गतिशील संसार या जगत् के*59 (यत्-शिरः) जिस शिर—ऊर्ध्वस्थान—आधार—इन्द्र ऐश्वर्यवान् परमात्मा को (इच्छन्) उपासक चाहता हुआ (पर्वतेषु-अपश्रितम्) पर्व वाले योगाङ्गों में*60 योगभूमियों में पहुँचा हुआ (तत्) उसको (शर्यणावति विदत्) उपासक ने शर्यणावत्—धनुष पर प्राप्त किया है—करता है। वह धनुष है प्रणव—ओ३म्*61। ओ३म् धनुष पर अपने आत्मा शर को चढ़ा देता है। ब्रह्म जो प्रणव ओ३म् का वाच्य लक्ष्य है, उसे प्राप्त करता है॥२॥
Footnote
[*59. “जागतोऽश्वः प्राजापत्यः” [तै॰ ३.८.८.४]।] [*60. “तप्पर्वमरुद्भ्याम्” [अष्टा॰ ५.२.१२२ वा॰]।] [*61. शर—बाण का लोहफलक, शर्य—फलकसहित बाण, शर्यणा—बाण को फेंकने के लिए झुकी ज्या—तांत या डोरी, शर्यणावत्—उससे युक्त धनुष “प्रणवो धनुः शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते” [मुण्डको॰ २.२.४]।]
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