Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 896

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- मेध्यातिथिः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
प꣡व꣢स्व विश्वचर्षण꣣ आ꣢ म꣣ही꣡ रोद꣢꣯सी पृण । उ꣣षाः꣢꣫ सूर्यो꣣ न꣢ र꣣श्मि꣡भिः꣢ ॥८९६॥

प꣡व꣢꣯स्व । वि꣣श्चर्षणे । विश्व । चर्षणे । आ꣢ । म꣣ही꣡इति꣢ । रो꣡द꣢꣯सी꣣इ꣡ति꣢ । पृ꣣ण । उषाः꣢ । सू꣡र्यः꣢꣯ । न । र꣣श्मि꣡भिः꣢ ॥८९६॥

Mantra without Swara
पवस्व विश्वचर्षण आ मही रोदसी पृण । उषाः सूर्यो न रश्मिभिः ॥

पवस्व । विश्चर्षणे । विश्व । चर्षणे । आ । महीइति । रोदसीइति । पृण । उषाः । सूर्यः । न । रश्मिभिः ॥८९६॥

Samveda - Mantra Number : 896
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 1;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(विश्वचर्षणे) विश्वद्रष्टा परमात्मन्! तू (पवस्व) मुझ उपासक के अन्दर आ—प्राप्त हो (मही रोदसी आपृण) मेरे महत्त्वपूर्ण दोनों किनारों—इहलोक जीवन और परलोक जीवन अर्थात् भोगपार्श्व और अपवर्गपार्श्व को अपने आनन्दरस धाराओं से आपूर कर दे*27 (उषाः सूर्यः-न रश्मिभिः) सूर्य जैसे प्रकाशधाराओं से उषावेलाओं को भर देता है॥५॥
Footnote
[*27. “रोदसी रोधसी विरोधनात् रोधः कूलं निरुणद्धि स्रोतः” [निरु॰ ६.१]
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