Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 890

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- अहमीयुराङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
प꣡व꣢मान꣣ र꣢स꣣स्त꣢व꣣ म꣡दो꣢ राजन्नदुच्छु꣣नः꣢ । वि꣢꣫ वार꣣म꣡व्य꣢मर्षति ॥८९०॥

प꣡वमा꣢꣯न । र꣡सः꣢꣯ । त꣡व꣢꣯ । म꣡दः꣢꣯ । रा꣣जन् । अदुच्छुनः꣢ । अ꣣ । दुच्छुनः꣢ । वि । वा꣡र꣢꣯म् । अ꣡व्य꣢꣯म् । अ꣣र्षति ॥८९०॥

Mantra without Swara
पवमान रसस्तव मदो राजन्नदुच्छुनः । वि वारमव्यमर्षति ॥

पवमान । रसः । तव । मदः । राजन् । अदुच्छुनः । अ । दुच्छुनः । वि । वारम् । अव्यम् । अर्षति ॥८९०॥

Samveda - Mantra Number : 890
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 1;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(पवमान राजन्) हे धारारूप में प्राप्त होनेवाले प्रकाशमान परमात्मन्! (तव-अदुच्छुनः-मदः-रसः) तेरा विघ्नक्षय पापरहित*20 हर्षकर रस या रसीला हर्ष (अव्यं वारं वि-अर्षति) पार्थिव शरीर*21 आवरक को लांघ कर अन्तरात्मा को प्राप्त होता है, सांसारिकरस विघ्न से क्षय से पाप से रहित नहीं। परमात्मन् तेरा रस विघ्न—बाधा से क्षय से पाप से रहित तथा आनन्दप्रद है, उसे तू उपासक को प्रदान कर—करता है॥२॥
Footnote
[*20. “यो वा अभिचरति योऽभिदासति यः पापं कामयते स वै दुच्छुनः” [जै॰ १.९३]।] [*21. “इयं पृथिवी वाऽविः” [श॰ ३.१.२.३३]।]
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