Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 881

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- गोषूक्त्यश्वसूक्तिनौ काण्वायनौ Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
ये꣢न꣣ ज्यो꣡ती꣢ꣳष्या꣣य꣢वे꣣ म꣡न꣢वे च वि꣣वे꣡दि꣢थ । म꣣न्दानो꣢ अ꣣स्य꣢ ब꣣र्हि꣢षो꣣ वि꣡ रा꣢जसि ॥८८१॥

ये꣡न꣢꣯ । ज्यो꣡ती꣢꣯ꣳषि । आ꣡व꣡ये꣢ । म꣡न꣢꣯वे । च꣣ । विवे꣡दि꣢थ । म꣣न्दानः꣢ । अ꣣स्य꣢ । ब꣡र्हि꣢षः꣢ । वि । रा꣡जसि ॥८८१॥

Mantra without Swara
येन ज्योतीꣳष्यायवे मनवे च विवेदिथ । मन्दानो अस्य बर्हिषो वि राजसि ॥

येन । ज्योतीꣳषि । आवये । मनवे । च । विवेदिथ । मन्दानः । अस्य । बर्हिषः । वि । राजसि ॥८८१॥

Samveda - Mantra Number : 881
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 6;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(येन च) ‘च-इति वाक्यसमुच्चयार्थः’ हे ऐश्वर्यवन् परमात्मन्! और तू जिस हर्षप्रद स्वरूप से (मनवे-आयवे) मननशील मनुष्य के लिए “आयवः-मनुष्यनाम” [निघं॰ २.३] (ज्योतींषि विवेदिथ) ज्ञानज्योतियों को जनाता है (मन्दानः) स्तुत किया जाता हुआ (अस्य बर्हिषः-विराजसि) इस उपासक के हृदयाकाश में विराजमान होता है।
Essence
परमात्मन्! तू अपने जिस हर्षप्रदस्वरूप से मननशील जन को ज्ञानज्योतियाँ जनाता है और जिस हर्षप्रद स्वरूप के कारण स्तुतिपात्र बना हुआ इस मननशील उपासक के हृदयावकाश में स्थान पाता है, वह हर्षप्रद स्वरूप प्रशंसनीय है॥२॥
Special