Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 88

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- पूरुरात्रेयः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
बृ꣣हद्व꣢꣫यो꣣ हि꣢ भा꣣न꣡वेऽर्चा꣢꣯ दे꣣वा꣢या꣣ग्न꣡ये꣢ । यं꣢ मि꣣त्रं꣡ न प्रश꣢꣯स्तये꣣ म꣡र्ता꣢सो दधि꣣रे꣢ पु꣣रः꣢ ॥८८॥

बृ꣣ह꣢त् । व꣡यः꣢꣯ । हि । भा꣣न꣡वे꣢ । अ꣡र्च꣢꣯ । दे꣣वा꣡य꣢ । अ꣣ग्न꣡ये꣢ । यम् । मि꣣त्र꣢म् । मि꣣ । त्रं꣢ । न । प्र꣡श꣢꣯स्तये । प्र । श꣣स्तये । म꣡र्ता꣢꣯सः । द꣣धिरे꣢ । पु꣣रः꣢ । ॥८८॥

Mantra without Swara
बृहद्वयो हि भानवेऽर्चा देवायाग्नये । यं मित्रं न प्रशस्तये मर्तासो दधिरे पुरः ॥

बृहत् । वयः । हि । भानवे । अर्च । देवाय । अग्नये । यम् । मित्रम् । मि । त्रं । न । प्रशस्तये । प्र । शस्तये । मर्तासः । दधिरे । पुरः । ॥८८॥

Samveda - Mantra Number : 88
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 9;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(भानवे देवाय-अग्नये) स्वयं प्रकाशस्वरूप अन्यों को प्रकाशित करने वाले परमात्मदेव के लिये (बृहद्-वयः-हि) अधिक से अधिक जीवनकाल अवश्य (अर्च) हे उपासको! अर्चित करो क्योंकि (मर्तासः प्रशस्तये) मरणशील—जन्ममरण में आए जन अपनी कल्याण प्राप्ति के लिये (यं मित्रं न) जिसको मित्र के समान (पुरः-दधिरे) सम्मुख लक्ष्य में रखते हैं।
Essence
संसार में जन्ममरण चक्र में पड़े जनों की प्रशस्ति—कल्याण भावना का नितान्त सहारा मित्र के समान साक्षात् परमात्मा ही है शोक दुःख ताप से ऊपर उठाए रखता है अतः प्रसिद्ध प्रकाशमान परमात्मा के लिये अपने जीवनकाल का अधिकाधिक भाग उसकी अर्चना में अर्पित करे, बाल्यकाल में तो उसका ध्यान सम्भव नहीं है, वृद्धावस्था में कुछ ही सम्भव है अधिक नहीं, अशक्ति और रोगों के कारण, अतः केवल यौवनकाल से ही उसकी आराधना का अभ्यासी बनना चाहिए वृद्धावस्था में भी वह अभ्यास साथ देगा ही॥८॥
Special
ऋषिः—आत्रेयः पुरुः (यहाँ ही—इसी जीवन में तृतीय मोक्षधाम का साधक बहुत यत्नशील अपने में परमात्मा को पूरण करने वाला)॥