Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 871

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- त्रित आप्त्यः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
रा꣣यः꣡ स꣢मु꣣द्रा꣢ꣳश्च꣣तु꣢रो꣣ऽस्म꣡भ्य꣢ꣳ सोम वि꣣श्व꣡तः꣢ । आ꣡ प꣢वस्व सह꣣स्रि꣡णः꣢ ॥८७१॥

रा꣣यः꣢ । स꣣मुद्रा꣢न् । स꣣म् । उद्रा꣢न् । च꣣तु꣡रः꣢ । अ꣣स्म꣡भ्य꣢म् । सो꣣म । विश्व꣡तः꣢ । आ । प꣣वस्व । सहस्रि꣡णः꣢ ॥८७१॥

Mantra without Swara
रायः समुद्राꣳश्चतुरोऽस्मभ्यꣳ सोम विश्वतः । आ पवस्व सहस्रिणः ॥

रायः । समुद्रान् । सम् । उद्रान् । चतुरः । अस्मभ्यम् । सोम । विश्वतः । आ । पवस्व । सहस्रिणः ॥८७१॥

Samveda - Mantra Number : 871
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 5;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(सोम) हे शान्तस्वरूप परमात्मन्! तू (अस्मभ्यम्) हम उपासकों के लिए (विश्वतः) सब प्रकार से—सर्वतोभाव से (सहस्रिणः) सहस्रों के समान—अत्यन्त महामूल्य (रायः) धनरूप (चतुरः समुद्रान्) चारों वाणियों—तेरे रचे वेदवचनों—स्तुति प्रार्थना उपासना और जपों को “वाग् वै समुद्रः” [ऐ॰ ५.५६] (आपवस्व) चरितार्थ कर।
Essence
शान्तस्वरूप परमात्मन्! कृपा कर हम उपासकों के अन्दर सर्वभाव से तेरे उपदिष्ट सर्वमहान् धनरूप चार वाणियाँ स्तुति प्रार्थना उपासना और जप चरितार्थ कर। इनके सेवन में निरत होकर तेरे दर्शन समागम पाने में सफल होवें॥३॥
Special