Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 870

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- त्रित आप्त्यः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ꣣भि꣡ ब्रह्मी꣢꣯रनूषत य꣣ह्वी꣢रृ꣣त꣡स्य꣢ मा꣣त꣡रः꣢ । म꣣र्ज꣡य꣢न्ती꣣र्दिवः꣡ शिशु꣢꣯म् ॥८७०॥

अ꣣भि꣢ । ब्र꣡ह्मीः꣢꣯ । अ꣣नूषत । यह्वीः꣢ । ऋ꣣त꣡स्य꣢ । मा꣣त꣡रः꣢ । म꣣र्ज꣡य꣢न्तीः । दि꣣वः꣢ । शि꣡शु꣢꣯म् ॥८७०॥

Mantra without Swara
अभि ब्रह्मीरनूषत यह्वीरृतस्य मातरः । मर्जयन्तीर्दिवः शिशुम् ॥

अभि । ब्रह्मीः । अनूषत । यह्वीः । ऋतस्य । मातरः । मर्जयन्तीः । दिवः । शिशुम् ॥८७०॥

Samveda - Mantra Number : 870
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 5;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(यह्वीः) महत्त्वपूर्ण (ब्राह्मीः) ब्रह्म—वेद सम्बन्धी (ऋतस्य मातरः) सत्य का स्वरूप प्रकट कराने वाली (दिवः शिशुं मर्जयन्तीः) अमृतधाम में शयन करने वाले परमात्मा को प्राप्त करने के हेतु “मर्जयन्त गमयन्तः” [निरु॰ १२.४३] (अभि-अनूषत) अभिमुखता से स्तुति करती है।
Essence
वेद में कही सत्य का स्वरूप दर्शाने वाली महत्त्वपूर्ण वाणियाँ अमृतधाम में वर्तमान परमात्मा के प्राप्त कराने हेतु उसकी पूर्ण स्तुति करती हैं, उनका सेवन करना चाहिये॥२॥
Special