Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 86

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- वसूयव आत्रेयः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
य꣡द्वाहि꣢꣯ष्ठं꣣ त꣢द꣣ग्न꣡ये꣢ बृ꣣ह꣡द꣢र्च विभावसो । म꣡हि꣢षीव꣣ त्व꣢द्र꣣यि꣢꣫स्त्वद्वाजा꣣ उ꣡दी꣢रते ॥८६॥

य꣢त् । वा꣡हि꣢꣯ष्ठम् । तत् । अ꣣ग्न꣡ये꣢ । बृ꣣ह꣢त् । अ꣣र्च । विभावसो । विभा । वसो । म꣡हि꣢꣯षी । इ꣣व । त्व꣢त् । र꣣यिः꣢ । त्वत् । वा꣡जाः꣢꣯ । उत् । ई꣣रते ॥८६॥

Mantra without Swara
यद्वाहिष्ठं तदग्नये बृहदर्च विभावसो । महिषीव त्वद्रयिस्त्वद्वाजा उदीरते ॥

यत् । वाहिष्ठम् । तत् । अग्नये । बृहत् । अर्च । विभावसो । विभा । वसो । महिषी । इव । त्वत् । रयिः । त्वत् । वाजाः । उत् । ईरते ॥८६॥

Samveda - Mantra Number : 86
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 9;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(विभावसो) हे विशेष बुद्धि के साथ वसने वाले उपासक! या विशेष भा—ज्योति जिसमें बसी है ऐसे—“चतुथ्यर्थे सम्बोधनम्” (अग्नये) परमात्मा के लिये (यत्-बृहत्-वाहिष्ठम्) जो महान् जीवन को वहन करने वाला प्राण या मन है (तत्-अर्च) उसे समर्पित कर (महिषी-इव) भूमि के समान उस परमात्मा से “भूरिति महिषी” [तै॰ ३.९.४.५] (त्वद्रयिः) तेरा अभीष्ट धन (त्वद्वाजाः) तेरे भोज्यपदार्थ (उदीरते) उभर आते हैं—प्रकट हो जाते हैं।
Essence
उपासक का बहुमूल्य पदार्थ प्राण या मन है यदि बुद्धिमान् उसे परमात्मा के प्रति समर्पित कर दे तो पृथिवी के धन और मोक्षपदार्थ उसे सदा प्राप्त होते रहेंगे कारण कि इनका हेतु या स्वामी तो परमात्मा है॥६॥
Special
ऋषिः—वसूयव आत्रेयाः-ऋषयः (मोक्षैश्वर्य चाहने वाले इसी जीवन में साधने वाले उपासक)॥