Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

Samveda Mantra 854

1875 Mantra
Devata- इन्द्राग्नी Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
उ꣣ग्रा꣡ वि꣢घ꣣नि꣢ना꣣ मृ꣡ध꣢ इन्द्रा꣣ग्नी꣡ ह꣢वामहे । ता꣡ नो꣢ मृडात ई꣣दृ꣡शे꣢ ॥८५४॥

उग्रा꣢ । वि꣣घनि꣡ना꣢ । वि꣣ । घनि꣡ना꣢ । मृ꣡धः꣢꣯ । इ꣡न्द्राग्नी꣢ । इ꣡न्द्र । अग्नी꣡इति꣢ । ह꣣वामहे । ता꣢ । नः꣣ । मृडातः । ईदृ꣡शे꣢ ॥८५४॥

Mantra without Swara
उग्रा विघनिना मृध इन्द्राग्नी हवामहे । ता नो मृडात ईदृशे ॥

उग्रा । विघनिना । वि । घनिना । मृधः । इन्द्राग्नी । इन्द्र । अग्नीइति । हवामहे । ता । नः । मृडातः । ईदृशे ॥८५४॥

Samveda - Mantra Number : 854
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 2;

Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Swami Brahmmuni Parivrajak) - हिन्दी
Meaning
(उग्रा) उभरे बल वाले (मृधः-विघनिना) संग्राम करने वाले काम आदि को विशेषरूप से मारने वाले (इन्द्राग्नी) ऐश्वर्यवान् ज्ञानप्रकाशवान् परमात्मा को (हवामहे) हम अपने अन्दर आमन्त्रित करते हैं (ता नः-ईदृशे मृडातः) वह ऐसा संग्राम संकट में हमारी रक्षा करता है “मृडयतिरुपदयाकर्मा” [निरु॰ १०.१६]।
Essence
ऐश्वर्यवान् और ज्ञानप्रकाशस्वरूप परमात्मा उपासक के अन्दर संग्राम मचाने वाले काम आदि शत्रुओं को सर्वथा नष्ट करता है और हमारी रक्षा करता है॥२॥
Special